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पत्रकारों की गलत भाषा व शैली चिंताजनक!

Yogesh Kumar Soni

सत्यम् लाइव, 27 सितम्बर 2021, दिल्ली।। किसी भी सरकार या नेता का विरोध करना कतई गलत बात नही हैं लेकिन कुछ मीडिया संस्थान या पत्रकार किसी भी बात या तथ्यहीन घटनाओं को लेकर जबरदस्ती अपनी उपस्थिति दर्ज कराने के लिए कुछ भी दिखा या बोल रहे हैं। बीते शनिवार प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का अमेरिका दौरा समाप्त हो गया। इस दौरे को लेकर कुछ लोग इस तरह का भ्रम फैला रहे थे कि इस बार मोदी को वहां सम्मान नही मिलेगा। कुछ पत्रकारों ने तो दौरे से पहले यह बोल दिया था कि अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडन मोदी से नही मिलेंगे व इसके अलावा तमाम ऐसी बातें लोगों के बीच पहुंचाई जिसका सच्चाई से कोई लेना देना नही था।

आश्चर्य और पीढ़ा तो इस बात की हो रही है कि देश के प्रधानमंत्री के लिए इस तरह की भाषा का प्रयोग हो रहा है। ऐसी घटनाओं को देखकर लगता है कि वह देश सही हैं जो जनता पर तानाशाही करते हैं। देश के राजा के खिलाफ बोलने वालों को प्रताडित कर किया जाता है। दरअसल दुख होता है जब आप तथ्यों से हटकर गंदी भाषा का प्रयोग करते हुए अपनी निराशा के चलते दर्शकों व पाठकों को भ्रमित करते हैं। यदि आपको सरकार की कमियां या दोष बताना है तो निश्चित तौर पर बताइये लेकिन गलत चीजों का प्रयोग करके अपना व पत्रकारिता का स्तर मत गिराइये।

कोरोना में केन्द्र सरकार की विफलता गिनवाने वाले पत्रकार यह नही समझ पा रहे थे यह विश्व को हिला डालने वाली वो महामारी है कि जिसमें मानव जीवन को चित कर दिया था। कोरोना के दोनों कालखंडो में अपने आप को विश्वशक्ति कहने वाले देश दुनिया से मदद मांगते नजर आए थे। हमें यह भी समझना होगा कि भारत जैसे अधिक जनसंख्या वाले देश में जनता को संभालना बेहद चुनौतीपूर्ण हैं। विपक्ष हर बात का ठीकरा मोदी पर फोडता है जो स्वभाविक रुप से विपक्ष का काम भी है लेकिन कुछ बागी पत्रकार इस घटना को इस तरह पेश करते हैं कि जैसे अब हिन्दुस्तान का अस्तित्व मानो खत्म हो गया हो।


यदि आपको अभिव्यक्ति की आजादी मिली है तो किसी के लिए भी आप भद्र भाषा का प्रयोग नही कर सकते। इस दौरे के लिए जो लोग यह कह रहे थे कि वहां जो बाइडन द्वारा सम्मान नही मिलेगा ऐसे लोगों की जानकारी दे दी जाए कि अहम मुद्दो के साथ चर्चा के अलावा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अपने साथ 157 कलाकृतियां और पुरावशेष लाए हैं। इसे भारतीय खजाने की घर वापसी भी कहा जा रहा है चूंकि ये पहले भारत की ही संपत्ति थी, जिससे चोरी या तस्करी के रूप में अमेरिका ले जाया गया था लेकिन अब वही कलाकृतियां और पुरावशेष भारत को वापिस दे दी गई हैं।

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इससे पहले इन कलाकृतियों को लाने का कई बार प्रयास किया जा चुका था लेकिन मोदी से पहले किसी भी भारतीय प्रधानमंत्री को यह सफलता नही मिली थी। प्रधानमंत्री द्वारा लाई गई मानव आकृति की तांबे धातू की बनी 2000 ईसा पूर्व वस्तु या दूसरी शताब्दी की टैराकोटा का फूलदान है व लगभग इक्कतर प्राचीन कलाकृतियां सांस्कृतिक हैं। इसके अलावा छोटी मूर्तियां हैं जो हिन्दू, जैन और बौद्ध धर्म से संबंधित है।
बहरहाल, इस तरह की तमाम घटनाएं है बताने व समझाने के लिए लेकिन मुद्दा यही है कि क्या आज हमारी भाषा व शैली का स्तर जो लगातार गिर रहा है इस पर लगाम लगाने के लिए क्या करना होगा।

पत्रकारिता एक मात्र ऐसा पेशा है जिसका हर वर्ग सम्मान करते हुए गंभीरता से लेता है। जहां कहीं से इसांफ नही होता वहां आज भी पत्रकारिता पर भरोसा किया जाता है। इस बात में कोई दोराय नही हैं कि किसी भी घटना को देखने के लिए हर किसी का अपना एक अलग नजरिया होता है लेकिन किसी बात का विरोध करने के चक्कर में हम यह ही भूल जाएं कि हमें क्या बोलना व लिखना है। हम लेख के माध्यम से किसी सरकार या नेता की पक्ष की बात नही कर रहे,यह बात सभी जनप्रतिनिधियों के लिए समझनी चाहिए। इस बात को भलिभांति समझा जा सकता है कि सभी लोग एक पार्टी व नेता को पसंद नही करते इसलिए सोशल मीडिया पर अपनी विचारधारा के साथ अपने भाव प्रकट करते हैं

लेकिन अब कुछ पत्रकारों ने विरोध का नया ही तरीका निकाल डाला जिससे जनता भ्रमित होने लगी। ऐसे पत्रकारों की खबरें या विडियों लोग बिना सोचे समझे शेयर करते हुए यकीन कर लेते हैं। देश के एक बडे पत्रकार ने अपने यू-टयूब चैनल के माध्यम से यह तक कह डाला कि अगर उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ अपने कहे अनुसार कोविड की वैक्सीन को पूरा कर देंगे तो मैं पत्रकारिता छोड दूंगा,और अब सरकार ने यह कर दिखाया तो वह पत्रकार बदले-बदले से नजर आ रहे हैं। हाल ही में एक चैनल से निकाली गई एंकर ने मोदी के अमेरिकी दौरे के लिए इतना कुछ बोल दिया था कि उसके बाद वह बुरी तरह ट्रोल हो रही हैं और लोग जमकर मजाक बना रहे हैं। इसलिए ऐसे लोगों को यह समझना चाहिए कि विरोध के चक्कर में मनगणत कहानी बनाकर प्रस्तुत न किया जाए।

योगेश कुमार सोनी
वरिष्ठ पत्रकार

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