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प्‍याज तामसी क्‍यों ? गर्मी में ही खाते हैं इसे।

सत्‍यम् लाइव, दिल्‍ली: प्‍याज को भारतीय शास्‍त्रोंं में तामसी होने की परिभााषा से नवाजा गया है। भारत में दो प्रकार का प्‍याज होता हैै एक लाल तथा दूसरा श्‍वेत। आज का विज्ञान कहता हैै कि प्रोटीन, कार्बोहाइड्रेट, कैल्शियम, लौह, विटामिन ए, बी तथा सी होता है। इसकी ताजी पत्तियों में कुछ अप्रिय गंधवाला उडनशील तेल होता है। इसमें एक स्थिर तेल भी होता है जिसमें एलाइड, प्रोपाइल, डाइसल्‍फाइड नामक पदार्थ है। दूसरी तरफ भारतीय शास्‍त्र अर्थात् पुरातन विज्ञान कहता है कि प्‍याज व्रणशोध, गृध्रसी, योषापस्‍मार, कास, चर्मरोग, शोधरोग, संधिवात के लिये अत्‍य‍न्‍त लाभकारी है। भावप्रकाश जी के अनुसार पालाण्‍डु वात शामक, पित्‍तवर्धक, कफवर्धक, वेदनास्‍थापन, शोधहर, ब्रणशोथपाचन एवं त्‍वचा के दोषों को दूर करता हैैै। पित्‍तवर्धक तथा ब्रणशोथपाचन के कारण प्‍याज मन के रज तथा तम दोनों को बढाने के कारण ही तामसी कहा गया हैैै। पित्‍तवर्धक होकर जब गैस सर में चढ जाती है तब सर में दर्द होता है। वैसे प्‍याज इस तरह का पित्‍त नहीं बढाता हैै परन्‍तु ब्रणशोथपाचन होने के कारण बाजीकरण के साथ सोचने की शक्ति को प्रभावित कर देता हैै। एक तरफ कज्‍जा प्‍याज खाने से आंतों की क्रिया शक्ति बढ जाती है और दस्‍त से पेट साफ हो जाता है तो दूसरी तरफ चीनी की तरह मन को रज और तम का गुुुुण बढा कर विचारों को उत्‍तेजित कर देता है।

पाचन क्रिया को स्‍वस्‍थ करने के उपाय:

कर्मकाण्‍ड करने के लिये सभी तामसी भोज्‍य का प्रयोग वर्जित कर दिया जाता है उसमें सबसे पहले नम्‍बर पर लहसुन है और दूसरे नम्‍बर पर प्‍याज। कर्मकाण्‍ड करने में सबसे ज्‍यादा आवश्‍यकता की मन उत्‍तेजित न हो अत: सबसे पहले तो उन सभी पवित्र मास में सभी तामसी भोज्‍य का खाना वर्जित है ऐसा नहीं है कि प्‍याज से ही पाचन क्रिया सुधरती है। पाचन ि‍क्रिया को सुधारने मेंं सबसे पहले नम्‍बर पर देशी गाय के घी का नम्‍बर आता हैै जो किसी भी शुभ कार्य या भोजन में सबसे ज्‍यादा भारतीय पुरातन विज्ञान मेें अर्थात् शास्‍त्रों में उत्‍तम माना जाता है। वहीं रसोई में जीरा, अजवाइन, धनिया, हींग जैसी बहुत सी चीज भी हैं जो पाचन क्रिया को बढा देता है। भारतीय शास्‍त्रों में चौ-मासे सहित पूरे ठण्‍डी भर प्‍याज खाने को मना किया गया है।

प्‍याज गर्मी का भोज्‍य है:

आज हम सब कुछ स्‍वास्‍थ को छोडकर स्‍वाद के लिये खाते हैं। वैसे ही आज प्‍याज को स्‍वाद भी स्‍वाद के लिये प्रयोग किया जाने लगा है। जब कि जेठ के मास में अन्‍य पित्‍तवर्धक औषधि न होें और व्‍यक्ति को ध्‍यान या पूजन करने का आनन्‍द लेना हो तो तामसी यानि प्‍याज को छोडना ही होगा क्‍योंकि प्‍याज मुख्‍य रूप से जेठ मास अर्थात् जब लू चलती है तब ही खाया जाता है। लू चलने पर अपने साथ रखने मात्र से मानव को लू लगने नहीं देता अत: जो न भी खाते हों वो अपने साथ लेकर चलते हैं। बाबा रामदेव जी कहते हैं कि प्याज का रस और राई का तेल बराबर मात्रा में मिलाकर गठिया होने पर मालिस करने पर गठिया की पीडा ठीक हो जाती है। पारकिन्‍स के रोगी जिनके हाथ सदैव काॅॅॅॅॅपते रहते हैं उनके लिये सफेद प्‍याज बहु उपयोगी है। …… सुनील शुक्‍ल उपसम्‍पादक

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