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बसन्त ऋतु का वात कारक माह है वैशाख

सत्यम् लाइव, 28 अप्रैल 2021, दिल्ली।। बसन्त ऋतु का द्वितीय मास वैशाख प्रारम्भ हो चुका है। बसन्त ऋतु में हवा की शुद्धता के बारे में, वेदों में बताया गया है साथ ही नववर्ष हम सब मनाते ही इसी कारण से है कि इस ऋतु की हवा में, नयी हरियाली के कारण शुद्धता होती है और यह वेदों से प्रमाणित है। भगवान विष्णु को शरद ऋतु का कार्तिक मास तथा बसन्त ऋतु का वैशाख मास में बहुत ही पसन्द है। अतः तुलसी दल, नीम, गौ दुग्ध, जल, वेदों के अनुसार हवन का विशेष महत्व बताया गया है।

वैशाख माह में वृष संक्रान्ति पड़ेगी। वैदिक गणित के अनुसार सूर्य 30 डिग्री से 60 डिग्री के बीच होगा। वृष संक्रान्ति का तत्व, पृथ्वी तत्व है और स्वामी ग्रह शुक्र है जो जल तत्व प्रधान है। इस माह का कारक भाव गुरू है आकाश तत्व प्रधान है।

शरीर विज्ञान के अनुसार शुक्र- आज्ञा चक्र का तथा गुरू- विशुद्ध चक्र का प्रतिनिधित्व करता है। जल तत्व प्रधान होेने के कारण यह मास शरीर में गुरू का स्थल विशुद्ध चक्र (गला) तथा शुक्र का स्थल आज्ञा चक्र (मस्तिष्क) की समस्या आने की प्रबल सम्भावनाऐं होती हैं। ये दोनों ही क्षेत्र अपनी शीतलता के कारण से जाने जाते हैं अतः जल की शुद्धता का ध्यान रखें। अगर शहर में हैं तो पानी को गर्म करके ही पियें। कुऍ का पानी सबसे ज्यादा शुद्ध बताया गया है। मिट्टी के मटके का पानी चैत्र मास से ही पिया जाता है।

जल और अग्नि तत्व में वैर है अतः अग्नि तत्व प्रधान पिछले मास से जो समस्या अग्नि तत्व तथा जल तत्व की है उसे सम करने पर विशेष ध्यान दें। कारक भाव गुरू होने के कारण, प्राकृतिक रूप से शुद्ध हवा का वाहक ये मास भी माना गया है क्योंकि गुरू सभी ऋतुओं का स्वामी है और कभी भी गुरू अशुभ नहीं होता है और गुरू सदैव ही ज्ञान देता है अतः गुरू का सीधा सम्बन्ध आत्मा अर्थात् प्राण वायु से है। बसन्त ऋतु में पीले पुष्प गुरू को अर्पिक करने से तथा साथ ही देशी गाय के घी का दीपक जलाकर या देशी गाय के गोबर से बनी धूपबत्ती या कण्डा जलाकर अपने घर में प्राणवायु का बढ़ते रहें।

इस मास को यदि वैदिक गणित के अनुसार समझें तो अग्नि तत्व और जल तत्व को ही मात्रा सम रखना होता है क्योंकि यह संक्रान्ति वात कारक भाव उत्पन्न करती है जिससे पेट में कब्जियत का प्रारम्भ होने की सम्भावना बढ़ जाती है और यही कब्जियत वात विकार के रूप में असंचित वात बनकर असर दिखाता है।

वात का संचय अगले माह से प्रारम्भ कर होगा परन्तु आप यदि अपने स्वास्थ्य के प्रति सतर्क नहीं हैं तो इसी मास से पित्त दोष के साथ पृथ्वी तत्व रूककर वात दोष को संचित करना प्रारम्भ कर देगा। अब कफ मात्र 7 दिन तक असर दिखायेगा इसके पश्चात् अगले माह से वात संचित का कार्य हमारा शरीर ऋतुओं के अनुसार करेगा। धार्मिक महत्व के अनुसार वैशाख मास में पालनहार भगवान विष्णु की पूजा की जाती है प्रातः सूर्यादय से पूर्व उठकर स्नान करने का विधान बताया गया है जिससे समस्त चक्रों की गर्मी मूलाधार चक्र में समाहित हो जाये।

सुनील शुक्ल

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