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अनाचार, अपमान व्यंग्य की चुभती हुई कहानी दिल्ली …दिनकर

सत्यम् लाइव, 23 सितम्बर 2021, सितम्बर, दिल्ली।। वैसे तो किसी भी महापुरूष को आज उसके जन्मदिवस पर याद करने की औपचारिकता निभाई जाती है शेष दिनों में तो उनके कथन के विरोध में काम किया जाता है। वैसे ही आज के दिन की जब जब बात चलेगी तो हिन्दी के एक महान वीर रस के कवि की सदैव यादा रखे जायेगें। और वो नाम है स्व. श्री रामधारी सिंह दिनकर जी का। ‘दिनकर’ जी का जन्म 24 सितंबर 1908 को बिहार के बेगूसराय जिले के सिमरिया गाँव में हुआ था। उन्होंने पटना विश्वविद्यालय से इतिहास, राजनीति विज्ञान में बीए किया। उन्होंने संस्कृत, बांग्ला, और उर्दू का गहन अध्ययन किया था। बी, ए, की परीक्षा प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण करने के बाद वे एक विद्यालय में अध्यापक हो गये। 1934 से 1947 तक बिहार सरकार की सेवा में सब रजिस्टार और प्रचार विभाग के उपनिदेशक पदों पर कार्यरत रहे। 1950 से 1952 तक मुजफ्फरपुर कालेज में हिन्दी के विभागाध्यक्ष भी रहें। तत्पश्चात् भागलपुर विश्वविद्यालय के उपकुलपति बने और उसके भारत सरकार में हिन्दी के सलाहकार बने। उन्हें पद्म विभूषण की उपाधि से भी अलंकृत किया गया। उन्हें पुरस्कारों में पुस्तक संस्कृति के लिये साहित्य अकादमी पुरस्कार तथा उर्वशी के लिये भारतीय ज्ञानपीठ पुरस्कार प्रदान किया गया। ऐसा महान व्यक्तित्व उसके जहन में सदैव निवास करता है जिसे हिन्दी के शब्दों सहित सत्यता में रूचि हो। वो लेखनी के माध्यम हम सबके के दिलों में सदैव अमर रहेंगे।

राजनैतिक के उच्च शिखर पर अपने ज्ञान की बदौलत बैठने वाले श्री दिनकर जी की कविताऐं आज की राजनीति में भी सत्यता का बोध कराती है। उन्होंने लिखा है कि ‘‘आजादी रोटी नहीं मगर दोनों में कोई वैर नहीं, पर कहीं भूख बेताब हुई तो आजादी की खैर नहीं।।‘‘ और आज जिस स्थिति में हम सब हैं वो साफ कह रहा है कि दिनकर के कथन पर एक बार विचार आवश्यक है। इसी कविता की अगली कुछ पंक्तियों में दिल्ली के लिये कहते हैं कि ‘‘हमने देखा यहीं पांडू वीरों का कीर्ति प्रसार, वैभव का सुख.स्वप्न, कला का महा.स्वप्न अभिसार, यही कभी अपनी रानी थी, तू ऐसे मत भूल, अकबर, शाहजहाँ ने जिसका किया स्वयं श्रृंगार।’’

और इस पंक्तियों पर जब मैंने एक कार्यक्रम में पढ़ा तो उस कार्यक्रम में पश्चात् एक लेक्चार साहिबा आज तक मुझसे नाराज हैं क्योंकि आज जो इतिहास वो स्वयं पढ़ा रही हैं वो आज की राजनीति के सहायक है और सम्प्रदाय प्रधान मैकाले के द्वारा बताये गये शिक्षा व्यवस्था को आगे बढ़ा रही हैं। उस दिन मुझे ऐसा लगा कि शिक्षक ही ‘दिनकर जी’ को नहीं जानता है तो आने वाली पीढ़ी को ये क्या पढ़ायेगा? दिनकर जी इसी कविता पर जरा आगे चलें तो आज के गरीब किसान पर भी कह रहे हैं कि “हाय! छिनी भूखों की रोटी छिना नग्न का अर्द्ध वसन है, मजदूरों के कौर छिने हैं जिन पर उनका लगा दसन है।” आगे चलकर कहते हैं कि ‘‘वैभव की दीवानी दिल्ली! कृषक मेघ की रानी दिल्ली! अनाचार, अपमान व्यंग्य की चुभती हुई कहानी दिल्ली!‘‘

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इन पंक्तियों का वर्णन किया जा सके इतनी समर्थ आज किसी भी कलम नहीं है। आज ऐसे ऐसे हिन्दी के जानकार हैं जो बसन्त ऋतु में ही ऑक्सीजन की कमी बताते हैं और दिनकर दान के लिये कहते हैं कि ‘‘ऋतुओं का ज्ञान नहीं जिनको वो, देकर भी मरता है।’’ ऐसे महान वीर रस के कवि को समझे बिना आज मैकाले शिक्षा पद्वति के तहत् जो शिक्षा व्यवस्था का प्रचार प्रसार हो रहा है उससे कहा जा सकता है कि भारत के समस्त महान व्यक्तित्व वालों को आज की राजनीति ने मात्र उनके जन्म और मरण दिवस पर माला पहनानने का बिड़ा उठा रखा है। और इस डिग्री बढ़ाओं की व्यवस्था में, ज्ञान न के बराबर है।

सुनील शुक्ल

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