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धरा का रक्षक काल है उत्‍तरायण काल

सत्‍यम् लाइव 30 अप्रैल, 20202 दिल्‍ली।। भारतीय शास्‍त्रों की अगर बात करें तो उत्‍तरायण काल में सूर्य पृथ्‍वी के करीब होता है और इस ऋतु काल मेें गर्मी तेज होती है ये बात राजीव दीक्षित, स्‍वामी दयानन्‍द सरस्‍वती जीे ने भारतीय गणितज्ञ आर्यभट्ट के सूर्य सिद्धान्‍त के आधार को लेकर कही है। आज जब नोवेल कोरोना के सक्रमण चारों ओर फैला हुआ है तब भी यही बात सिद्ध हो रही है। कोरोना के संंक्रमण को कम करने में भारत में राष्‍ट्रीय पर्यावरण अभियात्रिकी अनुसांधान संस्‍थान (नीरी) ने भी खुलासा किया है कि कोरोना के संक्रमण में कमी का कारण सूर्य का तापमान है ये प्रश्‍न मैं कई लोगों से अब तक कर चुका हूॅ परन्‍तु सब गोलमोल जबाव देते नजर आते हैं कितने ताप पर कोई भी वायरस जीवित रह सकता है तो भारतीय भूतपूर्व वैज्ञानिक राजीव दीक्षित ने स्‍वानु फलू के समय कहा था कि 27 डिग्री तक कोई भी वायरस जीवित रह सकता है। राष्‍ट्रीय पर्यावरण अभियात्रिकी अनुसांधान संस्‍थान ने महाराष्‍ट्र्र और कर्नाटक में किये हुए अध्‍ययन में बताया कि तापमान बढते ही वायरस का प्रकोप कम हो जाता है। अध्ययन से पता चला कि वायरस ठंड और सूखे की स्थिति में अधिक समय तक जीवित रह सकता है। यह 21-23 डिग्री तापमान पर सख्त सतह पर अर्थात् पक्‍की जगह पर जहॉ भी दलदल थोडा सा कम हो मात्र 2 घंटे तक जिंदा रह सकता है। 25 डिग्री से ज्‍यादा तापमान पर तो जीवित ही नहीं रह सकता है। महाराष्‍ट्र्र में तापमान बढने केे साथ 85 प्रतिशत और कर्नाटक में 88 प्रतिशत कमी आयी है। नीरी के अध्ययन के मुताबिक, ठंड में इसकी बाहरी सतह कड़ी हो जाती है, जिससे इसके ऊपर एक और परत पड़ जाती है और वायरस ज्यादा लचीला हो जाता है। यही वजह है कि ऐसे वायरस ठंड में ज्यादा सक्रिय हो जाते हैं। नीरी के अनुसार तापमान 23 डिग्री के लगभग पहुॅचते ही संक्रमण अपने आप समाप्‍त होने लगता है। साथ में ये भी कहा कि ”भारत का पर्यावरण तुलनात्मक रूप से कोेरोना के संक्रमण को रोकने में फायदेमंद साबित हो रहा है।” यही बात मैं लगातार स्‍वामी दयानन्‍द सरस्‍वती और महि‍र्षि राजीव दीक्षित के दिशा निर्देश के अनुसार कह रहा हॅॅॅूू कि सूर्य की गति इस समय उत्‍तरायण काल में है, अगस्‍त तारा की उपस्थित में ये संक्रमण भला भारत में कैसे जीवित रह सकता है ? इस विषय को लेकर जब भारत के धार्मिक संस्‍थान और कुण्‍डली के विशेषज्ञ से सम्‍पर्क किया तो उनके पास कोई जबाव नहीं होता और उल्‍टा मुझसे कहने लगते हैं कि अमेरिका में देखाेे, इटली में देखो कितने मरे हैं तब मैने उनसे पूछा कि अमेरिका और इटली का तापमान क्‍या है तो वो भी उन्‍हें नहीं पता। इस वाकिये को लिखकर मेरा कहना सिर्फ इतना है कि भारतीय शास्‍त्रों का अध्‍ययन से, भारतीय दिनचर्या तय होती है और इससे ही आने वाली पीढी अपने पर्यायावरण को समझ सकती है और काल के जानकारी की रक्षा स्‍वयं महाकाल करते हैंं यह वाक्‍य इसी ज्ञान से निकला है।

उपसम्‍पादक सुनील शुक्‍ल

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