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नव उदारवाद की तरफ बढाये जा सकते हैं कदम

सत्यम् लाइव, 17 जून 2021, दिल्ली।। कोरोना काल में सरकारें आगे आई है। प्रायः जो कुछ बाजार के भरोसे छोड़ दिया जाता रहा है उसे अब सरकारें नियंत्रित कर रही है।कोरोना काल के बाद जैसे ही सरकारें आगे आई है उसके बाद से कई विशेषज्ञ यह कहना शुरू कर चुके हैं कि हमने नवउदारवाद के अन्तर्गत जो नैरेटिव स्टेब्लिश किया था कि बाजार के भरोसे हमें सब कुछ छोड़ देने चाहिए क्योंकि बाजार सबकुछ स्वयं संतुलित कर लेता है,वह नैरेटिव अब कमजोर हो रहा है।कई विशेषज्ञ कह रहे है कि सरकार की भूमिका को नही नकारा जा सकता है और अब नवउदारवाद और बहुपक्षीयता का डिक्लाइन आएगा। अभी ब्रिटेन के कॉर्नवाल में जी-7 की बैठक हुई है उसमें सम्बंधित देश की सरकारें इस बात पर विचार की है कि मिनिमन कॉरपोरेट टैक्स को पंद्रह प्रतिशत तक लाकर फिक्स कर देना चाहिए। विशेषज्ञ इस कदम को भी सरकार द्वारा बाजार को नियंत्रित करना मान रहे हैं।विशेषज्ञ भविष्य में एक और प्रत्याशा को लेकर बैठे हैं कि सरकारें एक बार फिर क्रिप्टोकरेन्सी के विषय पर अपनी शक्ति का प्रयोग करेगी।क्योंकि क्रिप्टोकरेंसि सरकार नियंत्रित नही है और यदि मुद्रा जारी करनी की शक्ति सरकार के हाथ से निकल जायेगी तो उसके अस्तित्व को ही संकट हो जाएगा और ‘नेशन स्टेट’ की भावना कमजोर हो सकती है।

इसलिए सरकारें क्रिप्टोकरेंसी के विषय पर भी फेसिलिटेटर और नियामक के बदले नियंत्रक की भूमिका में आएगी ही। दूसरी ओर नवउदारवाद के समर्थंक मानते है कि क्रिप्टोकरेंसि के विषय पर स्टेट का नियंत्रक चरित्र स्वाभाविक तौर पर आएगा। सरकारें इस विषय को बाजार के भरोसे नही छोड़ेगी लेकिन कोरोना काल के बाद से राज्य के नियंत्रक चरित्र नियमित हो जाएंगे यह कहना थोड़ी जल्दबाजी होगी।नवउदारवाद के आलोचक भी मानते हैं कि यह व्यवस्था हमेशा से विपरीत परिस्थितियों से निकल जाती है।जैसा कि अमिरिकी पोलिटिकल सायंटिस्ट फ्रांसिस फुकुयामा भी कहते हैं। हमें थोड़ा इतिहास के झरोखे में झांकने चाहिए।

प्रथम महायुद्ध के बाद जब ‘ग्रेट डिप्रेशन’ आया था तो उदारवाद के भयंकर समर्थंक अमेरिकी राष्ट्रपति ‘फ्रेंकलिन डी रूजवेल्ट’ ने कई ऐसे कार्यक्रम चलाए थे जो उदारवाद के विपरीत था।जिसे ‘न्यू डील’ कहा गया था।यह एक सामान्य सी बात रही है कि मंदी के दौर में सरकारें अपने को आगे लाती है। बाजार मंदी से स्वतः निकल जायेगा यह कम ही देखा जाता है। 2008 के ‘सब प्राइम’ संकट के बाद बराक ओबामा ‘क्वान्टिटेटिव ईजिंग’ प्रोग्राम लेकर आये थे।अर्थव्यवस्था को बाजार के भरोसे नही छोड़ा था। तो कहने का अर्थ है कि मंदी के दौर में और विपरीत स्थिति में सरकार आगे आती रही है।और जे एम किन्स के सिद्धांत पर चलकर स्वयं आगे आकर बाजार में पैसे का फ्लो कराती है और निर्धनों को सामाजिक सहायता भी करती है लेकिन पुनः स्थिति सामान्य होने पर नियंत्रक से फेसिलिटेटर की भूमिका में आ जाती है।इसलिए इस सम्भवना को नकार नही सकते कि कोरोना की स्थिति सामान्य होने पर सबकुछ पहले जैसा हो जाएगा।फिलहाल समय के गर्भ में है।

 अंकित पराशर

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