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डगमगाती भारतीय अर्थव्‍यवस्‍था – 2

रामायण या महाभारत जो दूरदर्शन पर दिखाई जा रही है वो स्‍वयं बताती है कि ”वासुदवे कुटुम्‍बकम्” की भावना की प्रबलता ही हमारी संस्‍कृति है।

सत्‍यम् लाइव, 18 अप्रैल 2020 ।। दिल्‍ली दूसरी तरफ लाॅकडाउन की घोषणा के साथ ही कोरोना वायरस के चलते, कई राज्यों से श्रमिक अपने गाॅवों की ओर लौट गये हैं समय भी वो है जब खेतों में आलू, प्याज, गन्ना, दलहन इत्यादि की फसलें तैयार खडी हैं। गेहूँ की फसल भी तैयार खड़ी है। कोरोना वायरस में, सोशल डिस्टेसिंग के नियम के अनुसार खेती में लगा श्रमिक साथ बैठकर, फसल नहीं काट सकता है अतः मशीन जरूरी है आज ये आवश्यक इसी नियम के साथ जरूरी की जा रही है कल दूसरा नेता आकर बुराई करेगा और जो नयी तकनीकि पश्चिम देशों से आयी होगी, वो इस देश पर लागू करेगा। ये बात मौखिक नहीं कही जाती है पर प्रयोगात्मक रूप से भारत में लागू होती रही है और आगे भी होगी। दोषी बाद में, जनता को बताया जायेगा। सोशल डिस्टेसिंग के तहत किसानों पर, पुलिस ने लाठी चलाई है जब रीढ़ की हड्डी ही कमजोर होगी तो देश का कैसे मजबूत होगा? किसान की कोई जाति भी होती। सभी जातियों के किसान आज भी, भारत भूमि को अपनी माता मानकर, उसकी सेवा करके प्रसाद पा रहे हैं। अब किसान ही टूट चुका है जब उसकी जेब खाली होगी तो अगली बार वो भला कैसे खेती करेगा ? देश की आर्थिक मन्दी से जो हालात पैदा हुए हैं उसका एक कारण ये भी है कि अंग्रेजों के आने के बाद, भारतीय खेती लगातार नुकसान और नुकसान पर ही जा रही है। ऐसे बहुत से क्षेत्रों में, अग्रेजों ने खेती पर जो तय किया था वो आज भी चल रहा है। 1960 के बाद हरित क्रान्ति के नाम पर, फसल पर लगे कीडे को मारने के नाम पर, सिर्फ किसान ही नहीं बल्कि पूरा सम्पूर्ण मानस इससे खतरे में जीवित है।

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बिहार में सब्‍जी सडक पर रखकर प्रदर्शन

अपने विषय पर चलकर सोचें तो पता चलता है कि इतना बड़ा श्रमिकों के देश में यदि श्रमिक की ही जेब खाली होगी तो वस्तु की माॅग समाप्त हो जायेगी। तब बाजार में महामन्दी छा जायेगी। महामन्दी की परिस्थितियाॅ सीधी सी देखी जाये तो ज्ञात होता है कि ये दशा कुपोषण की तरफ ले रही हैं क्योंकि लोगोें के पास आय नहीं है तो बाजार में सामान कहाॅ से खरीदेगें। कुछ रिपोर्ट ऐसा भी बताती हैं कि पिछले 1 माह के अन्दर अनाज को छोडकर बहुत सी वस्तुओं के दाम तीन गुना बढ गये हैं। खाद्य एवं उपभोक्ता मंत्रालय और कृषि उत्पाद विपणन समिति के मुताबिक इसके 3 प्रमुख कारण है पहला कि थोक मंडियों में कृषि उत्पादों की आवक में 60 प्रतिशत की कमी आई है। दूसरा परिवहन के किराये में तेजी से उछाल आया है क्योंकि पहले तो ट्रक की आवाजाही बाधित है तीसरा श्रमिक की आवाजाही पर ऐसी कठोरता के साथ व्यवहार अंग्रेजों का इतिहास याद दिला देता है। ट्रक चालकों की संख्या मेंं, पिछले कुछ सालों में तेजी से कमी आयी है उस पर लाॅकडाउन के कारण 40 से 50 लाख ट्रक रास्ते में ही खड़े हैं और करीब 35,000 हजार करोड़ का माल बीच रास्ते में ही अटका पड़ा है। ऑल इण्डिया मोटर ट्रांसपोर्ट कांग्रेस के अध्यक्ष कुलतारन सिंह अटवाल ने कहा कि देश में 70 से 80 लाख है जिसमें से मात्र 10 प्रतिशत को आवाजाही की अनुमति है। साथ ही श्रमिक भी उपलब्ध नहीं हैं। अब पहले तो फसल खेतों में खडी है दूसरा यदि फसल कट भी जाये तो बेची कैसे जाये? अब औने-पौने दाम पर उत्पादन कर किसान बेंच रहा है। राजस्थान के ऑल इण्डिया किसान सभा के नेता अमराराम के मुताबिक मिर्च, मटर और कई अन्य उत्पाद किसानों ने सड़क पर फेंक दिये हैं। ये जो बाजार में उत्पाद की कमी बाजार में आ रही है इससे माॅग न आने का संकट बाजार मेें उत्पन्न होगा कारण ये है कि व्यक्ति के जीवन में आमदनी की कमी, शहर हो या गाॅव, सब जगह आयी है। जवाहर लाल नेहरू यूनिवर्सिटी के अर्थशास्त्री हिमांशु के मुताबिक घरों में खाद्य पदार्थो की कम खपत से, कुपोषण और बीमारियों के रूप में सामने आ सकती है। तमिलनाडु एग्रीकल्चर यूनिवर्सिटी के अर्थशास्त्री कहते हैं कि यदि किसान बाजार तक नहीं पहुॅॅचा तो गेहूँ और चावल की कीमत भी बढ सकती हैं। अभी 20 अप्रैल से सोशल डिस्टेसिंग के साथ स्पेशल जोन पर दयालूता पूर्ण कार्य प्रारम्भ होने जा रहा है परन्तु संकट इससे कम होने वाला नहीं है हमारी समस्या ये नहीं है कि हमारी जनसंख्या बहुत है बल्कि हमारी समस्या ये है कि हम भारतीय परिवेश को भूलाकर, अपनी भारत माता को पश्चिमी चश्में से देख रहे हैं। आधुनिकता के भूत को अपने ऊपर सवार करके सिर्फ और सिर्फ कृषि कार्य को निचले दर्जे में रख दिया है और अब नौकरी को उत्तम दर्जे का बना दिया है।

भारत में आज भी 70 प्रतिशत लोग श्रमिक हैं जो देश की रीढ की हड्डी कहे गये हैं।

भारतीय अर्थशास्‍त्रीय नोवेल पुरूस्‍कार विजेता अमृृत सेन तथा नोवेल पुरूस्‍कार विजेता अभिजीत वनर्जी एवं भारतीय रिजर्व बैंक के पूर्व गवर्नर (RBI) रघुराम राजन ने कहा है कि वह कोरोना वायरस से भारत में छा रही मंदी से उबारने में मदद के लिए तैयार हैं। उन्होंने कहा कि देश अगर मुझसे मदद मॉगेगा तो ‘हां’ ही कहूॅगा ये तो सत्‍य है कि लॉकडाउन के चलते इस समय कई सेक्टरों में आर्थिक गतिविधियां ठप पडी हैं जो देश को योगदान देती थींं। अभी तक की सरकारी विशेष रिपोर्ट ये ज्ञात हुआ है कि साथ ही अब 15,000 करोड के पैकेज, दूसरे वित्‍त प्रोत्‍साहन के लिये घोषणा हो सकती है परन्‍तु प्रश्‍न अभी खडे हैं और वो हैैं कि वासुदेव कुटुम्‍बकम की भावना से काम करने वाला आज तक की भारत की संस्‍कृति अब भला कैसे ”सोशल डिस्‍टेसिंग” पर काम करेगी? क्‍योंकि अभी रामायण या महाभारत जो दूरदर्शन पर दिखाई जा रही है वो स्‍वयं बताती है कि ”वासुदवे कुटुम्‍बकम्” की भावना की प्रबलता ही हमारी संस्‍कृति है।

भक्‍त और भगवान

भगवान भारतीय शास्‍त्रीय संगीत का आनन्‍द लेेते हुए
शबरी के राम, अधीर शबरी ने भगवान के दर्शन पाये

भारतीय पर आने वाले कही ने कई यात्री ने भारत की समाजिकता पर ही प्रशांसा के पुल बॉधे हैं एक यात्री ने तो यहॉ तक कहा है कि ”भारत में गरीब से गरीब आदमी अपनी पुत्री का विवाह ऐसे करता है जैसे राजा महाराजा हो।” दूसरी तरफ यूरोप के रोम में राजा क्लॉडियस था उसी राज्‍य में वैलेन्‍टाइन नामक से चर्च का पादरी था जिसने भारत की परम्‍परा पर सामाजिक दायरे अर्थात् ”वासुुदेव कुटुम्‍बकम्” को बढाने के लिये विवाह करवाना चालू किया। सामाजिक दायरेे में न रहने वाला रोम के राजा ने उसे फाॅॅसी पर चढा दिया। इसका पूरा वर्णन आप भारतीय भूतपूूर्व वैज्ञानिक राजीव दीक्षित के मुख से सुनने को मिल सकती है। इन सब परम्‍परा को निर्भाह करने वाला ये देश भला कैसेे इस नियम का पालन करेगा। यह विचारणीय है। कुछ तो नयेे सिरे से बाजार को खडा करनेे का नियम आया है जैसे कुछ ऑन लाइन भारतीय बडी कम्‍पनी और विदेशी कम्‍पनी के साथ मिलकर काम करना जा रही है ये कितना उचित होगा जब छोटा व्‍यापारी सोशल डिस्‍टेसिंग के तहत पर मारा जायेगा और बडा व्‍यापारी इसी का फायदा उठाकर बाजार पर कब्‍जा कर लेगा। ये भविष्‍य केे गर्त में छिपा है।

उपसम्‍पादक सुनील शुक्‍ल

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