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शारदीय ऋतु के आश्विन मास में स्वास्थ संस्कार का अध्यात्म विज्ञान

सत्यम् लाइव, 19 सितम्बर 2021, दिल्ली।। सनातन धर्म के अर्न्तगत आने वाले सभी त्यौहारों में भी स्वस्थ रहने की बहुत बड़ी वैज्ञानिकता छिपी हुई है। जो स्वयं ही ये वयां करती है कि ब्रम्हाण्ड अपने कर्मो के अनुसार सुरक्षित रखने वाला इन्सान यदि सर्वप्रथम स्वस्थ रहता है तो समस्त प्रकृति अपना विकराल रूप नहीं रखती है और यदि वो अपने ऐशोआराम में डूब जाता है तो वो अवश्य ही एक विकराल रूप रखकर सामने आ जाती है। अतः ये आवश्यक है कि ग्रहों का संस्कार अर्थात् गणना करके मानव को स्वयं तथा प्रकृति की रक्षा के लिये अपने कर्मो को करते रहना चाहिए।


शारदीय नवरात्रि अश्विन मास में कृष्ण पक्ष में पित्पक्ष मनाये जाते हैं इस काल अपने पूवेजों को अर्पण किया जाता है। अध्यात्म स्वयं में एक विज्ञान है जिसके लिये किसी भी प्रकार की मशीन की आवश्यकता नहीं है बल्कि वैदिक गणित की गणना की आवश्यकता पड़ती है इसी कारण से इसे आयुर्वेद अर्थात् मानव के स्वास्थ पर जब हमारे पर्वूजों ने खोज तो पाय कि पितृपक्ष और नवरात्रि को आयुर्वेद के अनुसार पित्त शोधन काल माना कहा गया है ये संस्कार (गणना) वैदिक गणित के अनुसार ही बताई गयी है। साथ ही श्राद्ध करते समय उन्हीं चीजों को इस्तेमाल बताया गया है जो आपको अपने पूर्वजों के बताये मार्ग पर चलना सीखाती हैं। जैसे प्रथम दिवस तिल और कुशा को हाथ में लेकर संकल्प लें कि अपने पूर्वजों को वो सारी चीजें अर्पण करेगें जो भारतीय प्रकृति और पर्यावरण के अनुसार शुद्ध हों। सर्वप्रथम गंगाजल, देशी गाय का दूध व दही, शहद, फल, धान, गेहूं, मूंग, सरसों का तेल और तिल का अर्पण कर प्रसाद लिया जाता है। तुलसी पत्र का प्रयोग भी श्राद्ध में अवश्य करना चाहिए। कारण पित्त का शेधन कर कफ को बढ़ने नहीं देती है। इन दिनो में अर्थात् श्राद्ध के दिनों वासी भोजन पर विशेष प्रतिबन्ध है। अर्पण करने के लिये जो कहा गया है उसमें लेख मिलता है कि जिसमें बाल गिर गया हो या जिसमें कीड़े पड़ रहे हों। इस कथन को यदि महर्षि राजीव दीक्षित के अनुसार समझें तो 48 मिनट के बाद भोजन वासी हो जाता है अर्थात् कीड़े पड़ना प्रारम्भ हो जाते हैं।

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1 पहली रोटी देशी गाय के और अन्तिम कुत्ते को खिलाएं।
2 इसके बाद भोजन भूमि या छत पर डालकर कौए को भी भोजन दें।
3 साथ ही चींटी और अग्नि को भी भोजन अर्पित करें।
4 इन सबके बाद ब्राह्मण (ब्रिम्हाण्ड के ज्ञाता को ब्राहम्ण कहा गया है) को भोजन कराएं।

सुनील शुक्ल

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