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सौर कोरोना एक परिचय

य: पृथिवीं व्‍यथमानामदृृंहद् य: पर्वतान् प्रकुपि‍तां अरम्‍णात्। यो अन्‍‍तरिक्षं विममे वरीयो यो द्यामस्‍तभनात् स जनास इन्‍द्र:।। ऋग्‍वेेद २/१२/२

अर्थ : जिसने परिभ्रमण करती हुई इस भूमि को स्थिर कर रखा है जिसने क्रुद्ध होते हुए पहाडों को रमणीय बना रखा है जिसने विस्‍तीर्ण आकाश का निर्माण किया है जिसने सूर्य को थाम रखा है हे मनुष्‍यों। वह परमैश्‍वर्यशाली भगवान ही है।

सत्‍यम् लाइव, 14 मार्च 2020, दिल्‍ली सूर्य सौर मण्‍डल का सबसे बडा पिण्‍ड है। सूर्य एक विशाल उर्जा का केन्‍द्र है। उस उर्जा का छोटा सा भाग पृृृथ्‍वी पर आता है 15 प्रतिशत भाग अन्‍तरिक्ष मेंं 30 प्रतिशत पानी को भाप बनाने में, बहुत सी उर्जा पेड-पौधे तथा समुद्र अवशोषित कर लेते हैं। सूर्य की सतह का निर्माण हाइड्रोजन, हिलियम, लोहा, निकेल, ऑक्‍सीजन, सिलिकन, सल्‍फर, मैग्निशियम, कार्बन, नियोन, कैल्‍शियम, क्रोमियम तत्‍वों को पाया जाता है। हाइड्रोजन 74% हिलियम 24% की मात्रा सबसे अधिक है। सूर्य की प्रकाश संश्‍लेषण की क्रिया से पृृृृृथ्‍वी पर जीवन सम्‍भव हो पाया है सूर्य के बाहरी हिस्‍सों में गैसों का घनत्‍व है। कहते हैं कि सूर्य के बारे जानना सदैव दीपक के बारे में जानना रहा है। उसकी प्रभामंडल को नग्‍न ऑखों से देखने लायक नहीं होता। सूर्य का आन्‍तरिक भाग प्रत्‍यक्ष प्रेक्षणीय नहीं है।

सौर कोरोना:- सूर्य की त्रिज्‍या को इसके केन्‍द्र से लेकर प्रभामण्‍डल के किनारे तक को कहा जाता है। सूर्य के बाहरी क्षेत्र पर प्रभामण्‍डल की अन्तिम परत दिखती है इससे भी बाहरी क्षेत्र को नग्‍न ऑखों से देखा जा सकता है सामान्‍यतया सूर्य की तरफ देखना बहुत मुश्किल होता है परन्‍‍‍तु पूूर्ण सूूूूर्ययग्रहण केे दाैरान जब प्रभामंडल को चन्‍द्रमा द्वारा पूूूूरा ढक लिया जाता है जिसे पूर्ण सूूूूर्ययग्रहण का समय कहा जाता है उस समय जो बाहरी सिरे से सूर्य की रोशनी निकलती है उसे सौर कोरोना कहते हैं। कोरोना चॉद और पानी की बूॅदों के विवर्तन केे द्वारा सूर्य के चारों ओर निर्मित एक पस्‍टेल हेलो को कहते हैं। 1959 और 1968 के बीच नासा उपग्रह पर काार्य प्रारम्‍भ हुआ 1970 के दशक में अमेरिका और जापान के संयुक्‍त साझे में दो आंतरिक्षयान हेलिओस और स्‍काईलैब अपोलो टेलीस्‍कोप माउंट ने सौर वायु तथा सौर कोरोना के महत्‍वपूर्ण डेटा वैज्ञानिकों के द्वारा लिये गये। लगभग 1974 में स्‍‍‍‍‍‍काईलैब ने पहली बार सौर संक्रमण क्षेत्र का तथा सौर कोरोना से निकली पराबैंगनी उत्‍सर्जन का निरीक्षण किया। 1989 के आते आतेे सौर कोरोना की हजारों छवियॉ को अधिग्रहण किया जा चुका था। 1991 में जापान योनकोह उपग्रह अर्थात् सौर पुुंंज उपग्रह ने एक्‍‍सतरंग दैर्घ्‍य पर सौर ज्‍वालाओं का अवलोकन किया। मिशन डेटा एकत्रित करना था अनके प्रकार की ज्‍वालाओं की लपटों को पहचाना तथा अत्यिधिक गतिविधि वाले क्षेत्र से दूर स्थित कोरोना को देखा तो ज्ञात हुआ कि वो अत्‍य‍धिक सक्रिय था। सूर्य के परे भाग को किरीट या कोरोना कहते हैं। कोरोना सूर्य की सबसे बडी पर्त है कोरोना का तीव्र तापमान अभी तक ज्ञात नहीं किया जा सका है। किरीट का वर्णक्रमपट्म (कोरोना केे स्‍पेक्‍ट्रम) से सदैव विकिरण होता रहता है, जिसमें कुछ दीप्तिमान रेखाऍ होती है भारतीय शास्‍त्रों को नकारता हुआ कहता है कि इन रेखाओं का कारण भी ज्ञात नहीं हो सका है जबकि ये ही इन्‍द्र धनुष कही जाती हैं।

अब यदा ‘ब्रम्‍हाण्‍डे तथा पिण्‍डे’ नामक वाक्‍य से तुलना करते हैं ये तो सब जानते हैैं

कि सूर्य की गति से ही भारत में त्‍यौहार मनाये जाते हैं और ये भी हम सब जानते हैं कि सूर्य और चन्‍द्रमा की गति के योग से पूरे एशिया में त्‍यौहार मनाये जाते हैंं। भारतीय अथर्ववेद के उपवेद आयुर्वेद मेेंं सम्‍पूर्ण शरीर की तुलना ग्रह की तुलना, मानव शरीर के चक्रों से की है भगवान कृष्‍ण ने भी अष्‍ठचक्र नौ द्वार की बात कही है मूलाधार चक्र का प्रतिनिधित्‍व करते हुए सूर्य ही बताया गया है और मूलाधार चक्र के कारण की ब्रम्‍हमूर्तत में उठने को कहा गया है वैज्ञानिक तर्क ये निकलता है कि सूर्य उदय होने से पहले न उठने पर मूलाधार चक्र गर्म होकर पेट में भरा हुआ पानी आंतों में चिपकने लगता हैै और कब्जियत की शुरूवात होती है ये पहली बीमारी है अर्थात् सूर्य अपनी गर्मी आपकी आंतो तक भेज देता है आप चाहे जहॉ लेटे होें। इसी मूलाधार चक्र में ही एक अग्नि जलती है जिसे जठरराग्नि कहते हैं। इस जठराग्नि की ज्‍वाला सभी की अलग अलग होती है ये क्षेत्र भी प्‍लाज्‍मा या स्‍वाधिष्‍ठान चक्र जिसका स्‍वामी ग्रह चन्‍द्रमा है तथा पानी द्वारा ही निर्मित होता। यहॉ तक कहा जाये कि अलग अलग समय पर इसका ताप बदलता रहता है तो अतिशोक्ति न होगी। कोरोना एक वैसे ही भयावह बना हुआ है जैसे कि शनि को भयावह बनाया गया है।

लगद मुनि द्वारा रचित ऋग और यजु. ज्‍योतिष है यजु. ज्‍योतिष का ये श्‍लोक जिसेे महान गणितज्ञ आर्यभट्ट ने अपने जीवन का उद्देश्य बनाया और सूर्य सिद्वान्‍त लिखी

अर्थात् जैसे मोर के सिर पर शिखा नाग में मस्तिक में मणि। वैसे ही वेदों को समझने के लिये ज्‍योतिष गणित का ज्ञान आवश्‍यक है। कहने का अर्थ है कि पर्यावरण की रक्षा के लिये ग्रहों के चरित्र को समझना आवश्‍यक है पर्यावरण की रक्षा करते हुए आप स्‍वयं अपने आप को समझ लेगें और प्रकृति को नुकसान न पहुॅचा तो कोई भी संक्रमण आपको बीमार नहीं कर सकता है। ये सिद्वान्‍त सूर्य सिद्वान्‍त केे शूक्ष्‍म अध्‍ययन से जान सका।

पुन: अब नॉवल कोरोना वायरस से कैसे बचें और सूर्य आपकी रक्षा के लिये कैसे संक्रमण कर मेष संक्रान्ति से एक माह मेष संक्रमण केे माध्‍यम से वायरस को मारता है। फिर चलते हैं वायरस से बचाव अभियान भाग -2 की तरफ …………

उपसम्‍पादक सुुुुुनील शुक्‍ल

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