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उत्तेजक मस्तिष्क की दाता है ऑनलाइन क्लास

सत्यम् लाइव, 7 सितम्बर 2021, दिल्ली।। दिल्ली के उपमुख्यमंत्री एवं शिक्षा मंत्री मनीष सिसोदिया ने कहा कि कोरोना काल में स्कूल खोलने से पहले हमने एक्सपर्ट और अभिभावकों से बातकर की। साथ ही आस पास के राज्यों में माहौल पर भी ध्यान दिया है। साथ ही प्रॉटोकॉल के तहत् पर आगे कार्य करने का निर्णय लिया है और मुझे खुशी है कि अभिभावक, अध्यापक सकारात्मक है बच्चे तो निश्चित रूप से खुश है। हमने किसी अभिभावाक को बाध्य नहीं किया है और न ही किसी बच्चे को बाध्य किया है। अभिभावक और बच्चे स्वयं स्कूल आने को तैयार हैं। साथ ही ये भी बता दिया है कि यदि आप स्कूल नहीं आयेगें तो ऑनलाइन से क्लास लेकर उपस्थिति रह सकते हैं। दिल्ली शिक्षा मंत्री ने कहा कि अब वो समय है कि पढ़ाई का हो अतः ऑनलाइन भी अपने बच्चों को पढ़ाने में पूरा सहयोग करें। अब शिक्षा पाना और ज्यादा आसान हो चुका है।

इतने बड़े-बड़े शब्द कहकर स्वयं की पीठ थपथपाने वाली सारी व्यवस्था जो आज की सारी सत्ता ने कर रखी है वो एक तरफ है तो दूसरी तरफ जो जन मानस की समस्या है वो बिल्कुल साफ नजर आ रही है। दूसरी पार्टी को दोषारोपित करते हुए स्वयं के उसी निर्णय को सही ठहराने की जो कला आज मंत्री के पास है वो किसी से भी छुपी नहीं है। शिक्षा का मस्तिष्क को शान्त करती है जबकि आज की शिक्षा जो ऑनलाइन कराई जा रही है वो मस्तिष्क हो ही सबसे ज्यादा उत्तेजक बना रही है। भारतीय शिक्षा व्यवस्था पर अध्ययन करने के पश्चात् ये कह रहा हूॅ कि आज की शिक्षा भारतीय संस्कृति और सभ्यता से और ज्यादा दूर ले जायेगी। हम सबका उसी मार्ग पर और ज्यादा कदम प्रबल कराया जा रहा है जिस मार्ग पर 1858 में मैकाले ने ले जाकर खड़ा किया था।

इस शिक्षा व्यवस्था में तथाकथित वैज्ञानिकता का आधार है क्योंकि विज्ञान मशीन से प्रारम्भ नहीं होता है बल्कि तत्वों से प्रारम्भ होता है और तत्वों का ज्ञान ही भारतीय शास्त्रों में भरा पड़ा है जिसे अन्धविश्वास बनाकर पश्चिम ने भारतीय शिक्षा में शमिल करा दिया और आज उपभोगवादी विज्ञान फल-फूल रहा है। हर बच्चें को उपभोगवादी बनाया जा रहा है क्योंकि सारे ही पोषक अर्थात् शिक्षक, माता-पिता ये सब उपभोगवादी बनाये जा चुके हैं।

जरा शान्त मन से विचार करो और भारतीयता को समझो। भारतीयता को पश्चिमी देश की नकल कराकर कब तक, किसी दूसरे के बताये मार्ग चलते रहोगे। अगर विकास की ये सही दिशा होती तो भारत के आदर्श पुरूषों ने ये मार्ग क्यों नहीं दिखाया? ये प्रश्न कल भी था आज की है और आने वाली पीढ़ी को इस प्रश्न का उत्तर खोजकर पुनः उसी मार्ग पर चलना ही पड़ेगा जिस मार्ग पर भारतीय शास्त्रों में चलना सीखाया गया है अन्यथा द्वार पर प्रलय जो अभी झॉक रही है खड़ी नजर जल्द आ जायेगी।

सुनील शुक्ल

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