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पितृ पक्ष में पितरों को अर्पण

सत्यम् लाइव, 19 सितम्बर 2021, दिल्ली।। भारतीय शास्त्रों के अनुसार पितृपक्ष में पूर्वजों का तर्पण किया जाता है। पितृ पक्ष में मृत्यु की तिथि के अनुसार श्राद्ध किया जाता है। किसी व्यक्ति की मृत की तिथि ज्ञात न हो तो ऐसी स्थिति में अमावस्या तिथि पर श्राद्ध किया जाता है। इस दिन सर्वपितृ श्राद्ध योग भी माना जाता है।

पूर्णिमा श्राद्ध 20 सितंबर, प्रतिपदा श्राद्ध 21 सितंबर, द्वितीया श्राद्ध 22 सितंबर, तृतीया श्राद्ध 23 सितंबर, चतुर्थी श्राद्ध 24 सितंबर, पंचमी श्राद्ध 25 सितंबर, षष्ठी श्राद्ध 27 सितंबर, सप्तमी श्राद्ध 28 सितंबर, अष्टमी श्राद्ध. 29 सितंबर, नवमी श्राद्ध 30 सितंबर, दशमी श्राद्ध 1 अक्तूबर, एकादशी श्राद्ध 2 अक्टूबर, द्वादशी श्राद्ध. 3 अक्टूबर, त्रयोदशी श्राद्ध 4 अक्टूबर, चतुर्दशी श्राद्ध. 5 अक्टूबर तथा अमावस्या 6 अक्टूबर के सर्व पितृ योग पर मनाई जायेगी। इस गणना के अनुसार इस बार पितृपक्ष 17 दिनों का होगा। शास्त्रों के अनुसार 17 दिन श्राद्ध तिथि में एक अतिरिक्त वृद्धि होना शुभ नहीं है। इस काल में शुभ व मांगलिक कार्यों नहीं किये जाते हैं।

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पितृपक्ष और नवरात्रि को आयुर्वेद के अनुसार पित्त शोधन काल माना कहा गया है ये संस्कार (गणना) वैदिक गणित के अनुसार ही बताई गयी है। साथ ही श्राद्ध करते समय उन्हीं चीजों को इस्तेमाल बताया गया है जो आपको अपने पूर्वजों के बताये मार्ग पर चलना सीखाती हैं। जैसे प्रथम दिवस तिल और कुशा को हाथ में लेकर संकल्प लें कि अपने पूर्वजों को वो सारी चीजें अर्पण करेगें जो भारतीय प्रकृति और पर्यावरण के अनुसार शुद्ध हों। सर्वप्रथम गंगाजल, देशी गाय का दूध व दही, शहद, फल, धान, गेहूं, मूंग, सरसों का तेल और तिल का अर्पण कर प्रसाद लिया जाता है। तुलसी पत्र का प्रयोग भी श्राद्ध में अवश्य करना चाहिए। कारण पित्त का शेधन कर कफ को बढ़ने नहीं देती है। इन दिनो में अर्थात् श्राद्ध के दिनों वासी भोजन पर विशेष प्रतिबन्ध है। अर्पण करने के लिये जो कहा गया है उसमें लेख मिलता है कि जिसमें बाल गिर गया हो या जिसमें कीड़े पड़ रहे हों। इस कथन को यदि महर्षि राजीव दीक्षित के अनुसार समझें तो 48 मिनट के बाद भोजन वासी हो जाता है अर्थात् कीड़े पड़ना प्रारम्भ हो जाते हैं।

  1. पहली रोटी देशी गाय के और अन्तिम कुत्ते को खिलाएं।
  2. इसके बाद भोजन भूमि या छत पर डालकर कौए को भी भोजन दें।
  3. साथ ही चींटी और अग्नि को भी भोजन अर्पित करें।
  4. इन सबके बाद ब्राह्मण (ब्रम्हाण्ड का ज्ञाता ) को भोजन कराएं।

सुनील शुक्ल

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