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न भूतो न भविष्‍यति ….. सुनील शुक्‍ल

सत्‍यम् लाइव, दिल्‍ली: 2 अक्‍टूूूूबर को भारत में दो महान पुरूष ने जन्‍म लिया है एक थे महात्‍मा गॉधी (2 अक्‍टूबर 1869 – 30 जनवरी 1949) तथा दूूूसरे न भूतो न भविष्‍यति भारत के द्वितीय प्रधानमंंत्री लालबहादुर शास्‍त्री (2 अक्‍टूबर 1904 – 11 जनवरी 1966)। भारत के दोनों निडर सुुपुत्रों ने अपने अपने काल में अंग्रेजों की सभा के बीच मेें खडे होकर उनके सारे कायदे और कानून को मानने से मना कर दिया। साउथ आफ्रिका में जज के सामने अपने सर पर लगी हुई टोपी को गुजराती स्‍वाभिमान कहकर पेश किया तथा जेल भेेज देने पर स्‍वयं जेल जाने को तैयार हो गये। कई बार ऐसा करने केे बाद अपनी टोपी के आदेश को निरस्‍त कराकर ही गॉधी जी ने दम लिया। ये उनके जीवन का पहला अहिन्‍सात्‍मक संघर्ष था। इसके बाद अंग्रेजों केे खिलाफ एक नहीं कई बार लोगों को एक जूट करके स्‍वदेशी अभियान चलाया था।

दूसरी ओर लाल बहादुर शास्‍त्री के लिये भारत के महान प्रवक्‍ता राजीव दीक्षि‍त का कथन था कि ”न भूतो न भविष्‍यति”। और सच ही है महात्‍मा गॉधी के स्‍वदेशी अभियान को आगे बढाते हुुुए शास्‍त्री जी ने अमेरिका से आने वाला पीएल-४८० गेहूॅ लेने से मना कर दिया और भारत मेें ”जय जवान जय किसान” का नाराा लगाकर गेहूूॅ की पैैैैैदाबर उपज बढाने में सहयोग किया। शास्‍त्री जी की साफ सुथरी छवि के कारण ही उन्हें 1964 में देश का प्रधानमन्त्री बनाया गया। उन्होंने अपने प्रथम संवाददाता सम्मेलन में कहा था कि उनकी शीर्ष प्राथमिकता खाद्यान्न मूल्यों को बढ़ने से रोकना है और वे ऐसा करने में सफल भी रहे। उनके क्रियाकलाप सैद्धान्तिक न होकर पूर्णत: व्यावहारिक और जनता की आवश्यकताओं के अनुरूप थे।

संक्षिप्त जीवनी लालबहादुर शास्त्री का जन्म 1904 में मुगलसराय में मुंशी शारदा प्रसाद श्रीवास्तव के यहाँ हुआ था। उनके पिता प्राथमिक विद्यालय में शिक्षक थे अत: सब उन्हें मुंशीजी ही कहते थे। बाद में उन्होंने राजस्व विभाग में क्लर्क की नौकरी कर ली थी। लालबहादुर की माँ का नाम रामदुलारी था। परिवार में सबसे छोटा होने के कारण बालक लालबहादुर को परिवार वाले प्यार में नन्हें कहकर ही बुलाया करते थे। जब नन्हें अठारह महीने का हुआ दुर्भाग्य से पिता का निधन हो गया। उसकी माँ रामदुलारी अपने पिता हजारीलाल के घर मिर्जापुर चली गयीं। कुछ समय बाद उसके नाना भी नहीं रहे। बिना पिता के बालक नन्हें की परवरिश करने में उसके मौसा रघुनाथ प्रसाद ने उसकी माँ का बहुत सहयोग किया। ननिहाल में रहते हुए उसने प्राथमिक शिक्षा ग्रहण की। उसके बाद की शिक्षा हरिश्चन्द्र हाई स्कूल और काशी विद्यापीठ में हुई। काशी विद्यापीठ से शास्त्री की उपाधि मिलते ही प्रबुद्ध बालक ने जन्म से चला आ रहा जातिसूचक शब्द श्रीवास्तव हमेशा हमेशा के लिये हटा दिया और अपने नाम के आगे ‘शास्त्री’ लगा लिया। इसके पश्चात् शास्त्री शब्द लालबहादुर के नाम का पर्याय ही बन गया। 1928 में उनका विवाह मिर्जापुर निवासी गणेशप्रसाद की पुत्री ललिता से हुआ। ललिता शास्त्री से उनके छ: सन्तानें हुईं, दो पुत्रियाँ-कुसुम व सुमन और चार पुत्र-हरिकृष्ण, अनिल, सुनील व अशोक। उनके चार पुत्रों में से दो- अनिल शास्त्री और सुनील शास्‍त्री अभी हैं, शेष दो दिवंगत हो चुके हैं। अनिल शास्‍त्री कांग्रेस पार्टी के एक वरिष्ठ नेता हैं जबकि सुनील शास्त्री भारतीय जनता पार्टी में चले गये।

राजनीतिक जीवन: “मरो नहीं, मारो!” का नारा लालबहादुर शास्त्री ने दिया था। संस्कृत भाषा में स्‍नातक करनेे केे पश्चात् देशसेवा का व्रत लेते हुए यहीं से अपने राजनैतिक जीवन की शुरुआत की। शास्त्रीजी सच्चे गान्‍धीवादी थे जिन्होंने अपना सारा जीवन सादगी से बिताया और उसे गरीबों की सेवा में लगाया। भारतीय स्‍वाधीनता संग्राम के सभी महत्वपूर्ण कार्यक्रमों व आन्दोलनों में उनकी सक्रिय भागीदारी रही और उसके परिणामस्वरूप उन्हें कई बार जेलों में भी रहना पड़ा। स्वाधीनता संग्राम के जिन आन्दोलनों में उनकी महत्वपूर्ण भूमिका रही उनमें 1921 का असयोग आन्‍दोलन, 1930 का दांडी मार्च तथा 1942 का ”अंग्रेजों भारत छोडो” में महात्‍मा गॉधी जी केे साथ महत्‍वपूर्ण भूमिका निभाई थी। गॉधी वादी विचारधारा ऐसी थी कि प्रधानमंत्री होने के पश्‍चात् सिर्फ दो धोती और कुर्ता ही था।

जब दूसरे विश्व युद्ध में इग्‍लैण्‍ड बुरी तरह उलझा हुआ था तब नेताजी ने आजाद हिन्‍द फौज को “दिल्ली चलो” का नारा दिया, दूसरी तरफ गॉधी जी ने मौके की नजाकत को भाँपते हुए 8 अगस्त 1942 की रात में ही बम्‍बई से अँग्रेजों को “भारत छोड़ो” का नारा दिया तथा “करो या मरो” का नारा दिया। 9 अगस्त 1942 के दिन शास्त्री जी ने इलाहाबाद पहुँचकर इस आन्दोलन के गान्धीवादी नारे को बडी चतुराई से “मरो नहीं, मारो!” में बदल दिया और अप्रत्याशित रूप से क्रान्ति को पूरे देश में प्रचण्ड रूप दे दिया। पूरे ग्यारह दिन तक भूमिगत रहते हुए यह आन्दोलन चलाने के बाद 19 अगस्त 1942 को शास्त्री जी गिरफ्तार हो गये। देशभक्‍तों को जानने के लिये आवश्‍यक है महान देशभक्‍त राजीव दीक्षित को सुना ही समझा भी जाये क्‍योंकि आज हम सब भारत की सभ्‍यता और संस्‍कृति से अलग होते जा रहे हैं। और पाते जा रहे हैं पश्चिमी सभ्‍यता जो हमारेे किसी काम की नहीं हैैैसुनील शुक्‍ल उपसम्‍पादक

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