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नवदुर्गा या नव आयुर्वेद

आयुर्वेद विश्व की प्राचीनतम चिकित्सा प्रणालियों में से एक है। यह विज्ञान, कला और दर्शन का मिश्रण है। ‘आयुर्वेद’ नाम का अर्थ है, ‘जीवन का ज्ञान’ और यही संक्षेप में आयुर्वेद का सार है।हिताहितं सुखं दुःखमायुस्तस्य हिताहितम्। मानं च तच्च यत्रोक्तमायुर्वेदः स उच्यते॥  -(चरक संहिता १/४०)
दुर्गा सप्‍तशती ग्रन्थ के अंतर्गत देवी कवच स्तोत्र में निम्नांकित श्लोक में नवदुर्गा के नाम क्रमश: दिये गए हैं–

प्रथमं शैलपुत्री च द्वितीयं ब्रह्मचारिणी।
तृतीयं चन्द्रघण्टेति कूष्माण्डेति चतुर्थकम्।।
पंचमं स्कन्दमातेति षष्ठं कात्यायनीति च।
सप्तमं कालरात्रीति महागौरीति चाष्टमम्।।
नवमं सिद्धिदात्री च नवदुर्गा: प्रकीर्तिता:।
उक्तान्येतानि नामानि ब्रह्मणैव महात्मना:।।

कुछ भारतीय ऋषियों का एक मत ये भी है कि ब्रह्माजी ने जो दुर्गा कवच में वर्णिन किया है वो नव माताएं वो हैं जो कुछ विशिष्‍ट औषधियों के भेष में हमारे सामने रहती है।

(1) प्रथम शैलपुत्री को हरड़ माने : कई प्रकार के रोगों में काम आने वाली औषधि हरड़ हिमालय की गोद में पायी जाती है अत: इस देवी शैलपुत्री कहते है। दो प्रकार के हरड़ बाजार में मिलते हैं – बड़ी और छोटी। बड़ी में पत्थर के समान सख्त गुठली होती है, छोटी में कोई गुठली नहीं होती, वैसे फल जो गुठली पैदा होने से पहले ही पेड़ से गिर जाते हैं या तोड़कर सुखा लिया जाते हैं उन्हें छोटी हरड़ कहते हैं। आयुर्वेद के जानकार छोटी हरड़ का उपयोग अधिक निरापद मानते हैं क्योंकि आँतों पर उनका प्रभाव सौम्य होता है, तीव्र नहीं। हरड की सात जातियाँ होती हैं: 1. विजया 2. रोहिणी 3. पूतना 4. अमृता 5. अभया 6. जीवन्ती तथा 7. चेतकी।

माता के भेष मेें रक्षक हरड-

  • हरड़ पेट के सभी रोगों से राहत दिलाती है।
  • हरड़ का सेवन करने से खुजली जैसे रोग से भी छुटकारा मिलता हैै।
  • अगर शरीर में घाव हो जांए हरड़ से उस घाव को भर देना चाहिए।
  • गर्भवती स्‍त्री के लिये हरड उपयोग न करे।

(2)  ब्रम्‍हचारिणी अर्थात् ब्राम्‍ही: दूसरी माता के भेष में हम ब्रम्‍हचारिणी को पूजते हैं। यह प्रकृृ‍ति में ब्राम्‍ही के रूप मेें दर्शन देती हैैं। सरस्‍वती के नाम से भी जाने वाली यह देवी प्रकृति में अपनी महानता केे लिये जानी जाती हैै। यह पूर्ण रूपेण औषधीय गुण लिये यह नाडि़यों के लिये पौष्टिक का कार्य करती है कब्‍ज को भी दूर करती है। इसके पत्‍ते के रस को पेट्रोल के साथ मिलाकर लगाने से गठिया दूर करती है। ब्राह्मी में रक्‍त शुद्ध करने के गुण भी पाये जाते है। यह हृदय को भी पौष्टिक देता है।

माता के भेष मेें रक्षक ब्राम्‍ही : आयुर्वेदिक दृष्टिकोण से ब्राह्मी में निम्न गुण पाये जाते है ब्राह्मी कषाय, मधुर, तिक्त, मधुर, शीत, लघु, कफवातशामक, आयुवर्धक, बुद्धिवर्धक, रसायन, दीपन, स्मृतिवर्धक, कंठशोधक तथा हृद्य होती है। ब्राह्मी का प्रयोग पाण्डु, प्रमेह, शोथ, विष, ज्वर, कण्डु, प्लीहा रोग, अरुचि, श्वास, कास, मोह, उन्मांद, अग्निमांद्य, विबंध, दौर्बल्यता, और वातरक्त नाशक होती है। तोतलापन– ब्राह्मी की पत्तियों को चबाकर खाने से तोतलेपन में कमी आती है।  आमवात– ब्राह्मी के पत्तों को पीसकर लगाने से आमवात में लाभ होता है। वातरक्त– 1-2 ग्राम ब्राह्मी चूर्ण को गुनगुने जल के साथ लेने से वातरक्त में लाभ होता है। 

(3) चंद्रघंटा अर्थात् चंदुसूर: मां दुर्गा का तीसरा रूप चंद्रघंटा देवी का है। इनको चमसूर या चंदुसूर भी कहा जाता है। इसी नाम सेे एक पौधा चमसूर या चंदुसूर है जो कि धनिये के सामान होता है। यह औषधि मोटापा दूर करने में लाभप्रद है इसलिए इसे चर्महंती भी कहते हैं। इस पौधे की पत्तियों की सब्जी बनाई जाती है। असल में यह पौधा मानव शरीर की चर्बी कम करता है और शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता को बढ़ाता है। इसके अलावा यह पैदा मानव की शारीरिक शक्ति को भी बढ़ाता है तथा उसको ह्रदय रोग से भी दूर रखता है।

(4) कूष्मांडा अर्थात् पेठा: चतुुुर्थ माता कूष्‍‍‍‍मांंडा तो जन जन की प्रिय हैं और भारत की धरती पर तो बहुउपयोग के रूप में पेठा की मिठाई प्रसिद्व है।इसलिए इस रूप को पेठा कहते हैं। इसे कुम्हड़ा भी कहते हैं जो रक्त विकार दूर कर पेट को साफ करने में सहायक है। मानसिक रोगों में यह अमृत समान है। आहार विशेषज्ञों का कहना है कि कद्दू हृदयरोगियों के लिए अत्यंत लाभदायक है। यह कोलेस्ट्राल कम करता है, ठंडक पहुंचाने वाला और मूत्रवर्धक होता है। यह पेट की गड़बड़ियों में भी असरदायक है। कद्दू रक्‍त में शर्करा की मात्रा को नियंत्रित करता है और अग्न्याशय को सक्रिय करता है। इसी कारण चिकित्सक मधुुुुुमेह रोगियों को कद्दू खाने की सलाह देते हैं। इसका रस भी स्वास्थ्यवर्धक माना गया है। कद्दू में मुख्य रूप से बीटा केरोटीन पाया जाता है, जिससे विटामिन ए मिलता है। पीले और नारंगी रंग के कद्दू में केरोटीन की मात्रा अधिक होती है। कद्दू के बीज भी आयरन, जिंक, पोटेेशियम एवं मैग्‍‍‍‍नेेशियम के अच्छे स्रोत हैं। २९ सितम्‍बर को ‘पंंपकिन डे’ के रूप में मनाया जाता है।

(5) स्कंदमाता अर्थात् अलसी: पंचम देवी स्कंदमाता औषधि के रूप में अलसी में विद्यमान हैं। यह वात, पित्त व कफ तीनोंं रोगों की नाशक औषधि है। गर्म स्‍वभाव होने के कारण अलसी का प्रयोग पुल्टिस, संधिशूल, कटिशूल, गठिया, वीर्य पुष्‍ठ अर्थात सन्‍तान उत्‍पत्ति के लिये किया जाता है।फाेेेेडा में अलसी को जल में पीसकर जौ का सत्‍तूू सहित खट्टेे दही के साथ लगा लेने से फोडा जल्‍दी पक जाता है। वात प्रधान फोडे पर अगर जलन और दर्द हो तो तिल और अलसी को तवे पर भूनकर देशी गाय के दूध के साथ मिलाकर ठंडा करके फोडे पर लेप करने से फोडेे में लाभ होता हैैै। इस पौधे के एँठलों से एक प्रकार का रेशा प्राप्त होता है जिसको निरंगकर लिनेन (एक प्रकार का कपड़ा) बनाया जाता है। तेल निकालने के बाद बची हुई सीठी को खली कहते हैं जो गाय तथा भैंस को बड़ी प्रिय होती है। इससे बहुधा पुल्टिस बनाई जाती है। आयुुुुर्वेद मेंं अलसी को मंदगंधयुक्त, मधुर, बलकारक, किंचित कफवात-कारक, पित्तनाशक, स्निग्ध, पचने में भारी, गरम, पौष्टिक, कामोद्दीपक, पीठ के दर्द ओर सूजन को मिटानेवाली कहा गया है। गरम पानी में डालकर केवल बीजों का या इसके साथ एक तिहाई भाग मुलेठी का चूर्ण मिलाकर, काढ़ा बनाया जाता है, जो रक्‍तातिसार और मूत्र संबंधी रोगों में उपयोगी कहा गया है।

(6) कात्यायनी अर्थात् मोइया: छठी देवी कात्यायनी को आयुर्वेद में कई नामों से जाना जाता है जैसे अम्बा, अम्बालिका व अम्बिका। इसके अलावा इन्हें मोइया भी कहते हैं। यह औषधि कफ, पित्त व गले के रोगों का नाश करती है।

(7) कालरात्रि अर्थात् नागदौन: यह देवी नागदौन औषधि के रूप में जानी जाती हैं। यह सभी प्रकार के रोगों में लाभकारी और मन एवं मस्तिष्क के विकारों को दूर करने वाली औषधि है। बवासीर में नागदोन का प्रयोग बहुत लाभकारी |इसके लिये नागदोन के 1 से 3 पत्ते व 1-2 कालीमिर्च को पीसकर रस निकल लें , उसमे से एक चम्मच रस को सुबह खाली पेट पियें , लाभ होगा। जिन माताओं बहनों को माहावारी के दिनों मेें रक्‍त बहुत आता हैै तो भी इसके पत्‍ते कालीमिर्च के साथ प्रयोग कर सकते हैं। शरीर के किसी स्‍थान पर सूजन है तो भी उसके पत्‍ते को बॉध सकते हैं।

(8) महागौरी अर्थात् तुलसी: तुलसी सात प्रकार की होती है सफेद तुलसी, काली तुलसी, मरूता, दवना, कुढेरक, अर्जक और षटपत्र। ये रक्त को साफ कर ह्वदय रोगों का नाश करती है। इसका उपयोग सर्दी-जुकाम, खॉसी, दंत रोग और श्वास सम्बंधी रोग के लिए बहुत ही फायदेमंद माना जाता है।

(9) सिद्धिदात्री अर्थात् शतावरी: दुर्गा का नौवां रूप सिद्धिदात्री है जिसे नारायणी या शतावरी कहते हैं। यह बल, बुद्धि एवं विवेक के लिए उपयोगी है। अनिन्‍द्रा रोग में शतावर की खीर में देशी गाय का घी मिलाकर माता का भोग लगाया जाता है। शतावर का प्रयोग सच मेें सिद्धिदात्री ही कहा जा सकता है स्‍त्री के किसी भी रोग में शतावर उपयोगी है। सुखी सांखी बराबर मात्रा में अडुसे के पत्‍ते तथा धागे वाली मिश्री के साथ पानी के साथ उबालकर दिन में तीन बार दी जाती है। देशी गाय केे दूध के साथ इसके जड का रस पिलाने से विष शान्‍त होता है। ……… सुनील शुुुुक्ल उपसम्‍‍‍पादक

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