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भारतीय नववर्ष तुम्हारा, अभिनन्दन

सत्यम् लाइव, 6 अप्रैल 2021, दिल्ली।। चैत्र मास के शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा से नववर्ष मनाने की परम्परा बहुत पुरानी है कहते हैं कि भारत के परम प्रतापी सम्राट चन्द्रगुप्त विक्रमादित्य ने संवत्सर को प्रारम्भ किया था। 13 अप्रैल 2021 से नवसंवत्सर 2078 प्रारम्भ होने जा रहा है। ब्रह्म पुराण के अनुसार इसी तिथि को नव सृष्टि की रचना की थी, साथ ही चैत्र शुक्ल प्रतिपदा को रेवती नक्षत्र के ‘‘निष्कुम्भ योग’’ में भगवान विष्णु ने मत्स्यावतार लिया था।

अंग्रेजों ने जब भारत को गुलाम बनाया और साथ ही अपनी व्यवस्था भारत में चलायी तब सबसे पहले उनकी योजना आयी कि ‘‘फूट डालो और राज्य करो’’। इस योजना के अन्र्तगत 2 फरवरी 1835 को मैकाले ने ब्रिटिश संसद में खड़े होकर कहा कि मैनें पूरे भारत का भ्रमण करके देखा है मुझे पूरे देश में एक भी भिखारी और चोर नहीं मिला, इतने ऊॅचे चरित्र, आदर्शवादी और गुणवान को यदि तोड़ना है तो उनकी आध्यात्मिक और सांस्कृतिक विरासत को समाप्त करना होगा। उसके लिये सबसे पहले भारत की शिक्षा व्यवस्था को समाप्त किया जो सौर मण्डल के अनुसार वैदिक गणित के आधार पर खडी थी।

इसी के आधार पर भारतीय ग्रहों के आधार पर वैदिक गणित जिससे भारतीय वैज्ञानिकता सिद्ध होती थी उसे अन्धविश्वास कहकर प्रचारित करना प्रारम्भ किया। आज हम सब वास्तव में विश्वास और अन्धविश्वास का अन्तर भूल चुके हैं और जो वैज्ञानिकता पश्चिमी की मशीनों द्वारा सिद्ध की जा रही है उसे ही सत्य मानते हैं क्योंकि आज वैदिक गणित समाप्त हो चुकी है और मैण्टल मैथ को ही वैदिक गणित बताकर पढ़ाया जा रहा है।

आज हम सबने मैकाले शिक्षा व्यवस्था ऐसी अपनाई है कि भारतीय प्रकृति और पर्यावरण के अनुरूप विकास न करके यूरोप और अमेरिका के अनुरूप स्वयं को विकसित करना चाहते हैं। लगभग सभी 1947 के बादे भारत में बनीं सरकारों ने उसी दिशा में विकास के कार्य को बढ़ाया है। आज सच में बहुत बड़ी संख्या में वो भारतीय भी है जो सिर्फ दूसरे को उपदेश देना चाहता है कि भारतीय शास्त्रों को पढ़ो जबकि वो स्वयं ही अपने ग्रन्थों को उठाकर भी नहीं देखता है।

इसी शिक्षा व्यवस्था के कारण इतना बड़ा वैज्ञानिकता का आधार छोड़कर हम सब जनवरी से नववर्ष मनाने लगे हैं जबकि अंग्रेजों के कलैण्डर में कई बार संशोधन किया जा चुका है और जो वैदिक गणित के अनुसार ज्ञात होता है कि आगे भी कई बार ये संशोधन होता ही रहेगा। वैज्ञानिकता का आधार तो भारतीय ग्रन्थों के अनुरूप ही है।

सुनील शुक्ल

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