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लॉकडाउन में अपना मानसिक स्तर ऊँचा कैसे रखें – अक्षय मेहरे भारतीय

सत्‍यम् लाइव, 17 अप्रैल 2020, मुंबई || भारत ही नही अपितु पूरी दुनिया लॉकडाउन की वजह से मानो रुक सी गयी हैं। संकट की इस घड़ी में राष्ट्र एवं समाज को बचाने की जिम्मेदारी हम सबकी हैं। हम सबको अपने अपने घरों में बैठकर के राष्ट्र एवम समाज के प्रति अपनी जिम्मेदारी निभानी पड़ेगी। शासन एवं प्रशासन से प्राप्त दिशानिर्देशों का पालन करना होगा। साथ ही साथ हमे हमारी मानसिक स्थिति भी ठीक रखनी होंगी, क्योंकि जहाँ पर भी हम हमारे मानसिक स्थिति पर से आपा खो देते हैं तो हमारी शारिरीक, आर्थिक एवं बौध्दिक स्थिति भी खो देते हैं। आज हम सभी को समझना होगा कि हम एक बहुत बड़ी चुनौती का सामना कर रहे हैं। लेकिन इससे असहज होने की आवश्यकता नहीं हैं, इस राष्ट्र ने इससे भी बड़े बड़े कई चुनौतियो का सफलतापूर्वक सामना किया हैं जिसमे हम विजयी भी हुए हैं।

माननीय प्रधानमंत्रीजी ने लॉकडाउन बढ़ाने की घोषणा करते ही, आपमे से कई लोगों को असहज प्रतीत हुवा होगा। क्योंकि सामान्य मनुष्य विचार करता हैं की वह दिनभर घर मे रहकर क्या करें, अपना समय कैसे व्यतीत करें इस वक्त मुझे अमेरिकी दार्शनिक सर हेनरी डेविड थोरो की याद आती हैं, वे कहते हैं “मुझे अकेला रहना पसंद हैं, और एकांत से अच्छा साथी इस दुनिया मे कोई नही हो सकता”

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आपको ज्ञात होगा की सत्रहवीं शताब्दी यूरोप में बौद्धिक विकास का प्रमुख समय था। जिसमे बहुत से व्यक्ति प्रसिद्ध हुए या मानो विश्वपटल पर प्रस्थापित हुए जिसमे आइज़क न्यूटन भी शामिल थे। यह बात है 1665 कि जिस समय आइज़क न्यूटन इंग्लैंड में स्थित कैम्ब्रिज यूनिवर्सिटी में एक कॉलेज हैं, जिसका नाम ट्रिनिटी है आज भी वह कॉलेज है वह पढ़ा करते थे। महान अर्थशास्त्री अमर्त्य सेन एवं राष्ट्र के प्रथम प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू भी उसी विद्यालय से जुड़े हुए हैं। उसी वर्ष यानी 1665 में लंडन में प्लेग जैसी महामारी फैल गई। बीमारी संसर्गजन्य हो तो उसे रोकना ही उसका इलाज हो सकता हैं। उस समय आइज़क न्यूटन भी अपने घर गए जो 100 KM वहा से दूर था, ओर संयोग ऐसा हुवा की एक साल तक उन्हें अपने घर मे ही क़ैद रहना पड़ा। उसका परिणाम यह हुवा की अर्ली कैल्कुलस जिसे हम आज कैल्कुलस कहते हैं उसकी शुरवात हुई। उसके बाद उन्होंने खिड़की के पास ऐसी जगह बनाई जहासे प्रकाश अंदर आ सके और कहते है वहासे ऑप्टिक का विकास शुरू हुवा। और सबसे रोचक बात जो आप भी कई बार सुने होंगे, जिस सेब के पेड़ के नीचे आइज़क न्यूटन बैठा करते थे वह पेड़ भी उनके वही घर के आंगन में था ओर वहाँसे ही गुरूवाकर्ष के सिद्धांत की शुरवात हुईं। वो वहीं वक्त था जहाँ उन्होंने अपने जीवन का 1665-66 साल गुजारा था।

विद्वान हमेशा अकेलेपन का फायदा उठाते हैं। जब हम अकेले होते है तो व्यक्ति अपने भीतर से सोचने लगता हैं। हमारी नज़र जब हम अकेले होते है, तो उन्ही चिज़ों पर जाती हैं जहाँ सामन्यात: नही जाती हैं। भगवान महावीर, भगवान बुद्ध इन्हें एकांत मिलने के लिए कोसों दूर जाना पड़ता था। आप भी ऐसा कुछ करिये, जब लॉकडाउन खत्म हो जाये तो आप पहलेसे कुछ आगे निकले। जीवन मे कठिन दौर ही अवसर लेके आते हैं, सफल राष्ट्र, सफल समाज एवं सफल व्यक्ति वही होता हैं जो हर संकट को अवसर में बदलने की क्षमता रखता हो। लोकमान्य तिलक ने भी गितरहस्य जैसे अमर ग्रंथ की रचना मंडाले के कारावास में ही कि थीं।

अक्षय उत्तमराव मेहरे
मुपो वर्धमनेरी
तालुका आर्वी, जिल्हा वर्धा, महाराष्ट्र
संपर्क क्र. 9766077209

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