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पहली बार सुभाष चन्‍द्रबोस ने कहा था राष्‍ट्रपिता

सत्‍यम् लाइव, दिल्‍ली: मोहनदास करमचन्द गांधी  (2 अक्‍टूबर 1889- 30 जनवरी 1948) भारतीय स्‍वातंत्ररता आन्‍दोलन के एक प्रमुख राजनैतिक एवं आध्यात्मिक नेता थे। वे सत्‍याग्रह (सविनय अवज्ञा) के प्रतिकार के अग्रणी नेता थे,  उन्‍होंने आजादी की नींंव सम्पूर्ण अहिन्‍सा के सिद्धान्त पर रखी गयी थी अहिन्‍सा का अर्थ असहयोग एवं स्‍वनिर्मित वस्‍तुओं का उपयोग करना था। आम जनता जिन्‍हें महात्मा गांधी के नाम से जानती है। वास्‍तव में संस्‍कृृृत भाषा में महात्मा अर्थात् महान आत्मा एक सम्‍‍‍‍‍मान सूचक शब्द है। गांधी को महात्‍मा के नाम से सबसे पहले 1915 में राजवैद्य जीवराम कालिदास ने संबोधित किया। उन्हें गुजराती भाषा में बापू का अर्थ पिता होता हैै अत: उन्‍हें बापू के नाम से भी जाना जाता हैै। सुभाष चन्‍द्र बोस ने 6 जुलाई 1944 को रंगून से भाषण देते समय पहली बार राष्‍ट्र्रपिता महात्‍मा गॉधी से अपनी आजाद हिन्‍द फौज के सैनिकों के आशीर्वाद मॉगा था। 2 अक्‍टूूूूबर को अर्न्‍राष्‍ट्रीय अहिन्‍सा दिवस के रूप में घोषित किया गया हैैै।

लाल बहादुर शास्‍त्री का (2 अक्‍टूबर 1904- 11 जनवरी 1966) जन्‍मदिन भी है। गॉधी जी का सदैव साथ निभाने वालेे तथा हर आन्‍दोलन में साथ देने वाले एक मात्र भारत के प्रधानमंत्री बने जिन्‍होंंने भारत माता को स्‍वाभिमानी ढंग से खडा करने का प्रयास किया था। विदेशी सारी शर्तों को किनारे करते हुए अमेरिका से पीएल-480 नामक गेहूॅ लेने से मना कर दिया था जब अमेरिका ने कहा कि आप भूखे मर जायेगें तब शास्‍त्री जी ने उसी अहिन्‍सात्‍मक अन्‍दाज में जबाव दिया था कि हम भारतवासी तो वैसे भी सप्‍ताह में एक दिन व्रत रखते हैं एक दिन और रख लेगें परन्‍तु अमेरिका से ये कूडा गेहूॅ जिसे जानवर भी नहीं खाते हैं नहीं लेगें। शास्‍त्री जी की इस बात पर आज भी कई बुर्जुग साेेमवार का व्रत रखते हुुुए ये परम्‍परा निभाते हैं जिसे आज का भौतिकवादी विज्ञान अन्‍धविश्‍वास कहता है। अहिन्‍सा के सिद्वान्‍त को आगे बढाते हुए शास्‍त्री जी को सदैव याद किया जाता रहेगा क्‍योंकि अहिन्‍सा जब तक धरती, सूरज और चन्‍द्रमा है तब अहिन्‍सा धरती माता के लिये आवश्‍यक है आज हम कृषि प्रधान भारतवासी ने अपनी मॉ के ऑचल में यूरिया और डीएपी डालकर विषैला बना दिया है। अत: अहिन्‍सा के पालन में पुन: अपनी माता के ऑचल से विषाक्‍त समाप्‍त करके उसी अहिन्‍सा के मार्ग पर चलें जिस पर कभी महावीर स्‍वामी, गौतम बुद्व, श्रीराम और भगवान कृष्‍ण गये थेे ऐसे ही अन्तिम इन दो महान सपुतों को आज के दिन सिर्फ याद ही नहीं बल्कि इनकी चरणों में बैठकर अपनी माता को कुमाता होने से बचाना है।

सुुुुनील शुक्‍‍‍ल उपसम्‍पादक

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