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पर्यावरण रक्षा भारतीय साहित्‍य का अध्‍ययन अनिवार्य है।

भारतीय साहित्‍य सदैव ही पर्यावरण का रक्षक रहा है जब जब विज्ञान अपनी चरम सीमा पर पहुॅॅॅॅचा है तब-तब प्रकृति ने अपनी विनाशा लीला दिखाई हैै। तत्‍व को जाने बिना जब मनुष्‍य ने अपनी क्षमता से अधिक विकास करने का प्रयास किया तभी प्रकृति ने अपने को बचाने का उपाय खोज लिया। प्रकृति कभी भी स्‍वयं विनाश लीला करने नहीं आयी है बल्कि इस विनाश लीला को निमंंत्रण स्‍वयं विकासवादी एवं भौतिकवादी मनुष्‍य ने स्‍वयं दिया है। विकास जब जब प्रकृति के अनुरूप किया जायेगा तब तब ये विकास कहा जायेगा परन्‍तु जैसे ही विकास प्रकृति को नुकसान पहुॅचाने के लिये कार्य करेगा। वैसे ही प्रकृति को स्‍वस्‍थ करने का तरीका खोज लेगी।

भारतीय शास्‍त्र भी विकास की बात करते नहीं थकते हैं और वो विकास भौतिकवादी नहीं बल्कि अध्‍यात्‍मवादी होता हैै। यह एक ऐसा विकास हैै जिससे हम भारतीयों को कभी भी मेमोरी कार्ड की आवश्‍यकता नहीं हुई क्‍योंकि अध्‍यात्‍म में मेमोरी को तेज करने की प्रबल क्षमता हैै। लेक‍िन भौतिकवादी विकास में ऐसी सुविधा नहीं है। एक छोटेे से उदाहरण से ही ऐसा सम्‍भव है कि हम सबको पुन: विकास की राह केे लिये भारतीय साहित्‍य का सहारा लेना ही पडेगा।

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