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दिशाहीन शिक्षा, उपभोगवादी विज्ञान में बढ़ा या घटा प्रदूषण

सत्यम् लाइव, 13 अगस्त, 2021 दिल्ली।। कानपुर के प्रमुख समाचार पत्र से 13 अगस्त को दो खबरें ऑनलाइन प्रकाशित की जाती हैं और दोनों ही खबरें एक दूसरे विपरीत होती हैं वो भी आज के वैज्ञानिक तर्क के आधार पर। इसी कारण से मैं बार-बार कहता हूॅ कि आज का विज्ञान मात्र उपभोगवादी विज्ञान के आधार पर काम करता है। जहॉ से आय का स्रोत्र होता है उसे ही प्राथमिकता का आधार बनाकर आपको बताता है।

कानपुर से प्राप्त सूचना के आधार पर विभागाध्यक्ष सिविल इंजीनियरिंग प्रो. प्रदीप कुमार ने बताया कि बारिश में धूल व धुएं के कण बह गये हैं साथ ही तेज हवा ने प्रदूषण के कारकों पर लगाम कसी है। एक्यूआइ की अच्छी मात्रा मानक के अनुसार 0-50 और संतोषजनक मानक 50-100 को कहा जाता है। दिनांक के अनुसार एक्यूआई छह अगस्त को 41 माइक्रोग्राम/मीटर क्यूब, सात अगस्त 40, आठ अगस्त 34, नौ अगस्त 38, 10 अगस्त 46, 11 अगस्त 57, 12 अगस्त 47 माइक्रोग्राम/मीटर क्यूब रहा है। अतः प्रदूषण अब नियंत्रण में कहा जा सकता है।

दूसरी तरफ प्रदूषण बढ़ने के कारण उर्सला के चिकित्सा अधीक्षक डा. ए.के. सिंह ने बताया कि डेंगू की पुष्टि वाले दो मरीज पाये गये हैं। जबकि एलएलआर अस्पताल में चार वहीं तथा निजी अस्पतालों में 15 डेंगू के मरीज का इलाज चल रहा है। मेडिकल कालेज की उप प्रधानाचार्या प्रो. रिचा गिरि ने के अनुसार डेंगू के लक्षण ओपीडी देखने लगे हैं। इन दोनों की बातों का एक ही शहर में होना और एक ही समय पर होना, वो भी मात्र 5 से 10 किलोमीटर दूरी से ऐसे दो अधिकारियों के संदेश जनता तक जाना उपभोगवादी विज्ञान की विशेषताओं का वर्णन करते है। डेंगू की खबर के साथ कहा गया है कि पिछले दो वर्षो से शहरी क्षेत्र में एंटी लार्वा का छिड़काव नहीं कराया और न ही फागिंग कराई गई जिसके कारण बारिश से मच्छरों का प्रकोप बढ़ा है।

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अध्यात्मवादी विज्ञान में हवन कराकर हवा से प्रदूषण को मुक्त कराया जाता था परन्तु उसे अन्धविश्वास बताया जाता है जो मैकाले ने प्रारम्भ कराया था वो आज खूब फल-फूल रहा है। इसमें कोई शक नहीं कि भारतीय शास्त्रों में किस औषधि से हवन किया जाये जो उस ग्रह द्वारा उत्पन्न अग्नि को उत्पन्न कर वायु प्रदूषण को स्वच्छ करके मानव शरीर के चक्रों तक को स्वस्थ करती है। इसका पूरा वर्णन भारतीय शास्त्रों में मिलता है परन्तु मैकाले शिक्षा पद्वति में इसको अमान्य घोषित किया गया है और उपभोगवादी विज्ञान को आगे बढ़ाते हुए प्रदूषण बढ़ाने वाले विकास आज तक कराये जा रहे हैं। एसी से प्रदूषण बढ़ने की बात न तो काई वैज्ञानिक कहता है न ही कोई नेता परन्तु कृषि प्रधान देश में, पराली पर कानून बनाकर गरीब इन्सान का चालान तक किया जाता है और प्रदूषण बढ़ाने वाले बड़ी-बड़ी मशीनों को मॅगाकर विकास बताया जाता है।

सुनील शुक्ल

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