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CEO मार्क जुकरबर्ग ने डेटा चोरी के मामले में तोड़ी चुपी

न्‍यूयार्क: फेसबुक आज निर्विवाद रूप से दुनिया का सबसे बड़ा सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म है। दुनियाभर के करोड़ों लोग और तमाम हस्तियां भी इससे जुड़ी हुई हैं। करोड़ों लोग हर वक्त इस प्लेटफॉर्म पर अपनी निजी जानकारियां शेयर करते रहते हैं। संभवत: आप भी ऐसा ही करते होंगे। लेकिन आगे से अपनी निजी जानकारी फेसबुक पर शेयर करने से पहले इस स्टोरी को एक बार जरूर पढ़ लें, क्योंकि यह आपके लिए बेहद जरूरी है। फेसबुक इन दिनों विवादों में घिरा हुआ है। दावा किया जा रहा है कि फेसबुक से करीब 5 करोड़ यूजर्स की निजी जानकारियां लीक हुई हैं। तो आइए जानें इस बारे में वह सब कुछ जो आपके लिए जानना जरूरी है…

ट्रंप को फायदा पहुंचाने की कोशिश

जिन पांच करोड़ यूजर्स की निजी जानकारियां फेसबुक से लीक हुई हैं वह सभी अमेरिकी लोगों से जुड़ी थीं। इसका फायदा साल 2016 में अमेरिकी राष्ट्रपति चुनाव में डोनाल्ड ट्रंप के लिए काम करने वाली फर्म कैम्ब्रिज एनालिटिका ने उठाया था। अमेरिकी चुनाव में डोनाल्ड ट्रंप की अप्रत्याशित जीत का श्रेय इसी फर्म को दिया गया था। गार्जियन और न्यूयॉर्क टाइम्स के ज्वाइंट एक्पोज में इस फर्म के संस्थापक क्रिस्टोफर वाइली ने कंपनी के काम करने के तरीकों के बारे में बताया था। हालांकि वाइली ने साल 2014 में ही कंपनी छोड़ दी थी। आरोप लग रहे हैं कि इस कंपनी ने मतदाताओं की राय को मैनिप्युलेट (अपनी तरह से बदलने) के लिए इन फेसबुक यूजर्स के डेटा में सेंध लगाई थी। अब इस मामले में फेसबुक के संस्थापक मार्क जुकरबर्ग से जवाब-तलब किया जा रहा है।

तो फेसबुक को हैक किया गया था?

फेसबुक ने हाल के दिनों में कहा कि कैम्ब्रिज ने जो कुछ किया वह डेटा सेंधमारी नहीं था, बल्कि फेसबुक ही समय-समय पर रिसर्च करने वालों को अकादमिक उपयोग के लिए इस तरह का एक्सेस देता है। यह यूजर्स की मर्जी पर निर्भर होता है। फेसबुक अकाउंट शुरू करने के दौरान यूजर्स से इस बारे में पूछा जाता है। लेकिन फेसबुक इस तरह से अकादमिक उपयोग के लिए जिस डेटा तक शोधकर्ता को पहुंच देता है, उसे बेचने की अनुमति नहीं देता। फेसबुक के अनुसार इस मामले में यही हुआ है।

आपको क्यों होना चाहिए चिंतित

अब आप सोच रहे होंगे कि डेटा में सेंध तो अमेरिकी यूजर्स के लगी और वह भी साल 2016 में। तो हमें क्यों चिंतित होना चाहिए? आपके इस प्रश्न का उत्तर यह है कि अगर अमेरिका में ऐसा हो सकता है तो फिर भारत में क्यों नहीं? वैसे भी कैम्ब्रिज एनालिटिका की वेबसाइट पर जो जानकारी दी गई है, साल 2010 में उसे बिहार विधानसभा चुनाव का कॉन्ट्रैक्ट मिला था। यही नहीं कुल टारगेट सीटों में से उसके क्लाइंट को 90 फीसद सीटों पर भारी जीत भी मिली थी। चर्चा तो इस फर्म के साल 2019 के आम चुनावों के लिए भी कई राजनीतिक दलों के संपर्क में होने की है। यानी सोशल मीडिया पर आपके व्यवहार को देखकर कंपनी आपको टारगेट कर सकती है और आप जिस भी विचारधारा से प्रभावित होकर मतदान करते हैं, यह आपको उसके उलट मतदान करने के लिए हर संभव तरीके से प्रभावित करने की कोशिश कर सकती है।

फेसबुक एप से होता है डेटा चोरी

फेसबुक पर कई ऐसे एप अक्सर हमारे सामने आती रहती हैं, जो हमें कभी बुढ़ापा तो कभी अगले जन्म के दर्शन कराते हैं। कई एप आपको मंगलग्रह की सैर कराने की बात करती हैं, तो कई अन्य एप आपका चेहरा सेलेब्रेटी से मिलाती हैं। ऐसी किसी भी एप का इस्तेमाल करने से पहले अच्छे से जांच-परख लें। क्योंकि ऐसी एप्स आपसे आपकी निजी जानकारी तक पहुंच मांगती हैं और आप उत्साह-उत्साह में उन्हें यह परमिशन दे देते हैं। इसी तरह की एप के जरिए फेसबुक से अमेरिका में यूजर्स के निजी डेटा में सेंधमारी की गई थी। अमेरिकी समाचार पत्र न्यूयॉर्क टाइम्स की रिपोर्ट के मुताबिक एक स्टडी के नाम पर ‘मायपर्सनैलिटी’ नाम के एक फेसबुक एप के जरिए यूजर्स के निजी डेटा में सेंध लगायी गई थी।

इन पार्टियों के संपर्क में कंपनी

कैम्ब्रिज एनालिटिका अब दक्षिण एशिया में अपने कदम पसारने पर जोर दे रही है। यह कंपनी फेसबुक और यूजर्स की मर्जी के बिना फेसबुक यूजर्स की व्यक्तिगत जानकारियों का व्यावसायिक इस्तेमाल कर रही है। कंपनी श्रीलंका, बांग्लादेश और भारत में संभावनाएं तलाश रही है। इसके लिए कंपनी को भारत में एक बिजनेस पार्टनर भी मिल गया है। ओवेलेनो बिजनेस इंटेलिजेंस (ओबीआई) प्राइवेट लिमिटेड नाम की कंपनी का कहना है कि 2019 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस और भाजपा उसके संभावित ग्राहक हैं। खबर है कि कंपनी न सिर्फ भारत में भाजपा और कांग्रेस के साथ बात कर रही है, बल्कि श्रीलंका में महिंदा राजपक्षे के साथ भी उनकी बात चल रही है। हालांकि खबरों के मुताबिक बात अभी शुरुआती चरण में ही है।

 

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