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शिक्षक की गोद में प्रलय और निर्माण दोनों खेलते हैं….. आचार्य चाणक्य

सत्यम् लाइव, 5 सितम्बर 2021, उत्तर प्रदेश।। भारत के भूतपूर्व राष्ट्रपति डॉ सर्वपल्ली राधाकृष्णन का जन्मदिन 5 सितंबर 1888 को तमिलनाडु के तिरुमनी गांव में एक ब्राह्मण परिवार में हुआ था। उनके जन्मदिवस को हम सब शिक्षक दिवस के रूप में मनाते हैं। उन्होंने अपने छात्रों से जन्मदिन को शिक्षक दिवस के रूप में मनाने की इच्छा जताई थी। राधाकृष्णन का निधन चेन्नई में 17 अप्रैल 1975 को हुआ। भारत की सभ्यता में गुरू का स्थान, माता-पिता से भी बड़ा माना गया है जिसे समाज में सभी जगह सम्मान की दृष्टिकोण से देखा जाता है। और हो भी क्यों न? एक सभ्य समाज के निर्माता के रूप में गुरू को ही सर्वश्रेष्ठ स्थान आज भी प्राप्त है।

इस विशेष दिवस पर श्री राघव गौवर्धन गौशाला के संस्थापक श्री राघव शुक्ल जी जो वर्तमान वैदिक शिक्षा केन्द्र पर अपने पूरे सहयोगियों के साथ काम कर रहे है उनसे विशेष बातचीत इस शिक्षक दिवस पर हुई। मैंने उनसे पूछा कि आज आप शिक्षक को किस रूप में देखते हैं? तो उन्होंने कहा कि वह चाणक्य का वो कथन याद आता कि शिक्षक के हाथ में निर्माण और विनाश दोनों ही पलते हैं अर्थात् अगर शिक्षक ज्ञानवर्धक शिक्षा अर्थात् भारतीयता के आधार पर शिक्षा देने की ठान ले तो निश्चित ही भारतीय आधारित समाज व राष्ट्र का निर्माण करता है। ये सत्य है कि एक भयमुक्त शिक्षक ही, भयमुक्त समाज की स्थापना कर सकता है। आज का शिक्षक अपनी प्रकृति के ज्ञान से दूर होने के कारण स्वयं डरा बैठा हुआ है। तो भला वो साहसी और निडर समाज की स्थापना क्या करेगा? जिसे यह खुद यह पता नहीं कि भारत की सभ्यता और संस्कृती क्या है? वो क्या भारतीय समाज के आधार पर भारतीय समाज को खड़ा करेगा।

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वर्तमान अध्यापक को शिक्षा पश्चिमी सभ्यता के आधार देने को वैज्ञानिकता का आधार मान रहा है। वह पश्चिमी सभ्यता को ही श्रेष्ठ बताकर उदाहरण देता है। इसमें हम सिर्फ शिक्षक कि कमी कहें तो यह गलत होगा। इसमे प्रशासन का भी पूरा योगदान है। प्रशासन ने हमारे पाठय पुस्तकों में भारत की संस्कृति और सभ्यता का कोई विषय पढाया ही नही जाता और पढाया भी जाता है तो वही नाम मात्र के लिए। जिसकी वजह से हमारा समाज मल्यवादी न होकर तथ्यवादी हो गया जो एक पश्चिमी सभ्यता की निशानी है।

मंसूर आलम

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