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डिजिटल इंडिया से ज्यादा लिट्रेट इंडिया की जरूरत

शिक्षा व्यवस्था पर सवालिया निशान लगते रहे है.हमेशा से भारत में शिक्षा का सत्तर नीरशयनी ही रहा है कभी बच्चों
की सुरक्षा के ऊपर कभी बिहार के टॉपर घोटाले की वजह से तो कभी सरकारी स्कूल की व्यवस्था के ऊपर. शिक्षा
व्यवस्था की तस्वीर कुछ ऐसी ही देखने को मिल रही है जिसे देखने के बाद लगता है सरकार ने अन्य परेशानियों से
कुछ नहीं सीखा ,बल्कि उस घटना के बाद व्यवस्था को दुरुस्त करने के बजाए सरकार चादर ताने सो रही है .हाल ही में
आई ऐन्युअल स्टेटस ऑफ़ एजुकेशन रिर्पोट ‘असर‘ की शिक्षा रिर्पोट ने लोगों की सोच पर एक सवाल खड़ा कर दिया
हैं। आज के युग में सभी बड़ों का मानना हैं कि भारत देश का युवा फोन और लैपटॉप में व्यस्त रह कर अपने भविष्य
पर प्रश्न चिन्ह उठा रहे हैं। वही हकीकत इस सोच से बिल्कुल परे हैं, असर और एनजीओ प्रथम की एक रिर्पोट से इस
झूठ से पर्दा उठा हैं। यह रिर्पोट विशेष तौर पर 14 से 18 वर्ष के बच्चो पर की गई जो प्राथमिक विधायलों में हैं। कुल
1,078 युवा इस सर्वे का हिस्सा थे। जो 60 गावों के निवासी हैं। वर्ष 2005 से ही असर हर वर्ष यह सर्वे करता हैं। यह सर्वे

जनता एवं सरकार को सच से रुबरु कराती हैं। इससे जुडे कुछ त्थय इस प्रकार हैं।

1)74.4 प्रतिशत इन्टरनेट से अनजान
2)64.6 प्रतिशत कम्प्यूटर चलाना ही नहीं जानते
3)23.3 प्रतिशत कभी मोबाइल का उपयोग ही नहीं किया
4)तमिलनाडु के एक जिला मदुरई में 3.5 प्रतिशत लोंगो ने कभी मोबाइल का उपयोग ही नहीं किया और 27.1 प्रतिशत
ने कम्प्यूटर का उपयोग
और यहीं 59.6 प्रतिशत लोंगो ने इन्टरनेट का प्रयोग नहीं किया।
24 पारसना में ,
मात्र 52 प्रतिशत ही भारत की राजधानी जानते हैं और राष्ट्रीय स्तर पर मात्र 64.1 प्रतिशत ही भारत की राजधानी का
नाम जानते हैं।
66 प्रतिशत ही अपने गृह राज्य का नाम जानते हैं और राष्ट्रीय स्तर पर औसतन 78.6 प्रतिशत ही अपने गृह राज्य
का नाम जानते हैं।
83.6 प्रतिशत ने ही स्कूलों में दाखिला लिया है और राष्ट्रीय स्तर पर 79.5 प्रतिशत ने स्कूलों में दाखिला लिया है

 

(प्रशांत राय )

 

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