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जाने गणेश जी के प्रथम पूजा से जुड़ी कथा

किसी भी धार्मिक कार्यक्रम या शुभ कार्य में सबसे पहले भगवान गणेश की ही पूजा करना सबसे जरूरी बताया गया है। ऐसी मान्‍यता है कि देवता भी अपने कार्यों को बिना किसी विघ्न से पूरा करने के लिए गणेश जी की अर्चना सबसे पहले करते हैं। ऐसा इसलिए है क्योंकि देवगणों ने स्वयं ही उनकी अग्रपूजा का विधान बनाया है।

ये है कथा

शास्त्रों में इस बात का जिक्र आता है कि एक बार भगवान शंकर त्रिपुरासुर का वध करने जाते हैं परंतु उन्‍हें सफलता नहीं मिलती। इस असफल प्रयास जानने का जब उन्‍होंने प्रयास किया तो गंभीरतापूर्वक विचार करने लगे कि आखिर उनके कार्य में विघ्न क्यों पड़ा। तब महादेव को ज्ञात हुआ कि वे गणेशजी की अर्चना किए बगैर त्रिपुरासुर से युद्ध करने चले गए थे। इसके बाद उन्‍होंने अपने पुत्र गणेशजी का पूजन करके उन्हें लड्डुओं का भोग लगाया और दोबारा त्रिपुरासुर पर आक्रमण किया। इसके बाद ही उनका मनोरथ पूर्ण हुआ। ऐसा विश्‍वास है तभी से गणेश की पूजा के बाद ही कार्य शुरू करने की परंपरा प्रारंभ हुई।

परेशानियों को दूर करते हैं गणेश

सनातन एवं हिन्दू धर्म शास्त्रों में गणेश जी को, विघ्नहर्ता यानि सभी तरह की परेशानियों को खत्म करने वाला बताया गया है। पुराणों में भी गणेशजी की भक्ति शनि सहित सारे ग्रहदोष दूर करने वाली बताई गई हैं। इसीलिए मानते हैं कि प्रत्‍येक बुधवार को गणपति की उपासना से सुख-सौभाग्य बढ़ता है और सभी तरह की बाधायें दूर होती हैं।

 

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