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मोर कुटी पै मोर चुगावत जहां श्रीराधा मोर नचावत

मथुरा: बरसाना श्री राधा जन्मोत्सव द्वितीय दिवस पर सुबह ब्रह्मा चल स्थिति मोर कुटी पर श्री राधा कृष्ण के स्वरूप द्वारा मयूर लीला की गई । भगवान कृष्ण यहां पर मोर बनकर नाचे। द्वापर युग में इसी स्थान पर भगवान श्री कृष्ण ने मयूर बनकर राधा रानी को रिझाया था। राधा रानी को मोरों से बड़ा ही लगाव है नृत्य देखने की इच्छा जब उनके मन में उत्कंठा हुई तो ललिता विशाखा चंपक लता चित्रा सखी रंग देवी सुदेवी इंदुलेखा तंग विद्या आदि सखियों के साथ राधा रानी ने अपनी उत्कंठा बताई । तब सखियां को साथ लेकर राधा रानी इसी स्थल पर मोर कुटी पहुंची मयूर ना देख कर राधा रानी जब निराश होने लगी तो भगवान ने अपनी प्रियतमा श्री राधा रानी को प्रसन्न करने के लिए मयूर का स्वरूप धारण कर नृत्य करने लगे राधा रानी ने देखा कि यह तो बड़ा ही सुंदर नृत्य कर रहा है , तो उनके मन में मयूर को दाना चुगाने की इच्छा हुई और उन्होंने मयूर को दाना चुगाना प्रारंभ कर दिया । मयूर बने श्री कृष्ण राधा रानी को बार-बार निरख रहे थे इसे देखकर सखिया समझ गई कि यह मोर अलौकिक एवं दिव्य लगता है । जरूर कुछ ना कुछ है । ललिता बड़ी मर्मज्ञ राधा रानी की प्रधान सखी हैं भगवान कृष्ण को पहचानने में देर नहीं की और राधा रानी को बताया कि यह तो स्वयं लीलाधारी श्रीकृष्ण है।

आनंद मगन राधा रानी ने लड्डुओं की बरसात की। आज भी भाद्रपद शुक्लपक्ष की नवमीं को मोरकुटी पर स्वरूपों द्वारा लड्डू बरसाए गए। जन्म उत्सव में सम्मिलित हुए श्रद्धालुओं ने बड़े ही भाव विभोर होकर इस लीला का आनंद लिया। श्री बांके बिहारी प्रागट्य कर्ता स्वामी श्री हरिदास जी ने इसी स्थल पर बैठकर राधा रानी का भजन किया उन्हीं के संप्रदाय द्वारा प्रतिवर्ष लीला का आयोजन किया जाता है। मोर कुटी के महंत जयदेव ने बताया कि मेरी तो जीवन आधार लाडली जू है, उन्हीं की कृपा से हम उनकी लीला का आनंद ले पा रहे हैं। इस लीला को देखने के लिए प्रतिवर्ष हजारों श्रद्धालु देश के कोने-कोने से बरसाना पहुंचते हैं ,जिन पर लाडली जी की कृपा है वही लीला का आनंद ले पाते हैं । बृज में राधा रानी के जन्म के साथ ही बधाईयों का जोर शोर देखने को मिल रहा है। लाडली के निज महल में नवमी तिथि को ढाणी ढाड़िन लीला की गई। कहते हैं कि राधा जन्म की खबर जब वृषभान जी के ढाणी को मिली तो वह राधा जी के दर्शन करने के लिए महल पहुंच गया । राधा रानी के दर्शन कर ढाणी जब अपने घर पहुंचा तो ढाड़िन ने पूछा कि आप कहां गए थे ,ढाणी ने अपनी ढाड़िन को बताया कि मैं वृषभान जी की पुत्री श्री राधा रानी को देखने गया था । यह सुनकर ढाणिनिया मचल गई ढाणी ने ढाणिन को मनाने का प्रयास किया लेकिन वह नहीं मानी, तब ढाणी ने कहा कि मैं तुमको राधा रानी के दर्शन के लिए लेकर चलता हूं इस बात को सुन खुशी से झूम उठी। ढाणी ढाणिन दोनों नाचते-गाते राधा रानी के महल पहुंचे और जमकर दोनों ने नृत्य किया राधा रानी के पिता एवं वंशजों का वर्णन कर वंशावली का बखान किया ।

इस लीला को आज भी राधा जन्म के द्वितीय दिवस की संध्या को प्रस्तुत किया जाता है लीला को देखने के लिए बृजवासी जन एवं श्रद्धालु 300 सीढ़ियां चढ़कर राधा रानी के निज महल में पहुंचते हैं । लीला को देख आनंदमग्न होकर बधाइयां बधाइयां बधाइयां गाते हुए अपने-अपने घर जाते हैं राधा जन्म के तृतीय दिवस में विलास गढ़ पर लीला आयोजित की जाती है। जिसको देखने के लिए श्रद्धालु ब्रह्मा चल के विलास गढ़ पर पहुंचते हैं। विलास गढ़ पर श्री कृष्ण राधा रानी की राधा रानी राधा रानी की दर्शन की इच्छा लेकर जोगिन का भेष बना बैठ कर भजन करने लगे करने लगे राधा रानी की सखियों ने बताया कि एक बड़ी सुंदर योगिन एक बड़ी सुंदर योगिन विलास गढ़ पर बैठकर पर बैठकर भजन कर रही है यह सुनकर राधा रानी अपनी सखियों के साथ बरसाना स्थित विलास गढ़ की पहाड़ी पर योगिनी जी के दर्शन के लिए पहुंची जब योगिन बार-बार बार-बार किशोरी जी को निहार रही थी सखियों ने जान लिया है तो छद्मवेश जारी श्रीकृष्ण ही है।

योगी नहीं बड़ो वियोगी भोगी भंवर निधान

ललिता ने राधा रानी को बताया कि श्यामा जी यह श्रीकृष्ण ही योगिन का रूप धारण कर बरसाना आए हैं। तब ललिता आदि सखियों ने श्री कृष्ण का का राधा रानी से मिलन कराया इस लीला को देखने के लिए दूर-दूर से लोग बरसाना पहुंचे ।

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